जीवन के 77वें पड़ाव पर पहुंच गए हैं मुलायम सिंह यादव। डॉ. राममनोहर लोहिया की गिरफ्तारी के विरोध में 18-19 साल की उम्र में आंदोलन और गिरफ्तारी देकर अपने संघर्ष के गुण को सार्वजनिक करने वाले मुलायम अब अपनों से लेकर पराए लोगों तक के लिए ‘नेताजी’ हो गए हैं।
उनको जानने वाले मुलायम की पहचान रिश्तों की कद्र करने वाले, अपनों की फिक्र करने वाले और विरोधियों को भी सम्मान देने वाले तथा लक्ष्य के लिए हर वक्त मैदान में कूद पड़ने वाले के रूप में करते हैं।
पुराने लोगों की जुबान पर आज भी तमाम ऐसे किस्से हैं, जो नेताजी को सियासत के मैदान में कुछ अलग खड़ा करते हैं। उनके चाहने वालों में पार्टी के लोग हैं तो बाहरी भी कम नहीं। कुछ ऐसे भी हैं जो पहले उनके नजदीक थे, पर कुछ वजहों से आज साथ नहीं है।
पर, मुलायम की बात चले तो इनके मुंह से सिर्फ यही निकलता है, ‘सार्वजनिक रूप से कुछ कह तो नहीं पाऊंगा, पर किसी के लिए भी मुश्किल है मुलायम जैसा बनना। इसलिए, नेताजी! जिएं हजारों साल।’ मुलायम की शख्सियत जानने के लिए कई लोगों से बात की अखिलेश वाजपेयी ने।
यारों के यार हैं नेताजी
भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन बताते हैं, ‘मुझे यह कहने में कोई दिक्कत नहीं है कि वे यारों के यार हैं। ऐसे यार, जो रिश्तों में कभी सियासत को नहीं आने देते और लाभ का मौका होने पर भी कभी घटिया सियासत नहीं करते। घटना मुझसे ही जुड़ी है।
मेरे जन्मदिन पर कुछ लोगों ने साड़ी वितरण का कार्यक्रम रखा था। भीड़ के कारण उसमें दुखद हादसा हो गया। मुलायम उस समय मुख्यमंत्री थे। मैं नेता प्रतिपक्ष। चुनाव भी नजदीक था।
तमाम लोगों ने इसे सियासी रंग देने की कोशिश की। मुलायम सिंह बाहर थे। सूचना मिलते ही वह लखनऊ आए और सीधे हमारे घर पहुंचे। ऐलान किया कि यह सिर्फ हादसा है, हादसे के अलावा और कुछ नहीं।’
मुलायम के पुराने साथी मेरठ के चौधरी राजपाल सिंह भी बताते हैं, ‘वर्ष तो नहीं याद है, लेकिन संभवत: 1981 की ही बात होगी। मैं मेरठ के कुछ लोगों को साथ लेकर कुछ समस्याओं के समाधान के लिए 12 तुगलक रोड (चौधरी चरण सिंह का आवास) गया था।
पता चला कि अंदर रामनरेश यादव बैठे हुए हैं। हम लोग बाहर ही रुक गए। इसी बीच, मुलायम सिंह यादव भी वहां पहुंच गए। हमसे राम-राम हुई और फिर उन्होंने कहा, ‘तुम हमारे साथ चलना। हम तुम्हारी पैरवी करेंगे। अंदर रामनरेश जी हैं।
उन्होंने हम लोगों के बारे में चौधरी साहब को बहुत कुछ भर दिया होगा।’ राजपाल बताते हैं कि कुछ कारणों से रामनरेश यादव, मुलायम सिंह को बहुत पसंद नहीं करते थे। बहरहाल, ‘रामनरेश बाहर निकले और मुलायम सिंह के साथ हम लोग अंदर पहुंचे। कमरे में जैसे ही मुलायम ने कदम रखा तो चौधरी साहब बोले, ‘तुम्हारा नाम मुलायम सिंह बहुत गलत है।’
मुलायम सिंह ने तपाक से जवाब दिया, ‘नहीं चौधरी साहब! हमारा नाम बिल्कुल ठीक है। दोस्तों के लिए मुलायम और दुश्मनों के लिए सिंह।’ बकौल राजपाल चौधरी साहब हंस पड़े। फिर हम लोगों की पैरवी करके मुलायम सिंह ने वह सब कुछ करवा दिया जो मेरठ के समाजवादी चाहते थे।
साथियों पर कभी समझौता नहीं
पूर्व मंत्री भगवती सिंह कहते हैं, ‘बात 1993 की है। सूबे में सपा और बसपा की सरकार थी। मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे। कांशीराम को मेरा और रमाशंकर कौशिक को मंत्रिपरिषद में शामिल करना काफी नागवार गुजरा था।
उनकी तरफ से हम दोनों को हटाने का लगातार दबाव पड़ रहा था। मुझे मालूम था कि मुलायम सिंह सुबह 4 बजे टहलते हैं। मैं पहुंच गया। वे चौंके और बोले, ‘इतनी सुबह-सुबह! सब ठीक तो है न।’ मैंने अपने कुर्ते की जेब से इस्तीफा निकालकर उन्हें पकड़ा दिया।
कहा, ‘सरकार न टूटे, इसलिए इसे स्वीकार कर लें।’ उन्होंने मेरा त्यागपत्र फाड़कर फेंक दिया। बोले, ‘हटेंगे तो सब लोग, नहीं हटेगा तो कोई नहीं। साथी नहीं टूटने चाहिए। सरकार भले ही टूट जाए।’
पुराने साथी शतरुद्र प्रकाश भी इस तरह का एक प्रसंग बताते हैं, ‘1989-90 में मैं प्रदेश सरकार में मंत्री था। जब-तब लालकृष्ण आडवाणी पर हमला बोल देता।’ भाजपा जनता दल की सरकार का समर्थन कर रही थी।
आडवाणी जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह से शिकायत की और कहा, ‘मुलायम से कहिए कि शतरुद्र को मंत्रिमंडल से हटा दें।’ शायद यह मुलायम सिंह जैसा नेता ही कह सकता था, ‘सार्वजनिक जीवन में तो आलोचना होती ही रहती है। सिर्फ आलोचना करने के कारण मैं किसी को नहीं हटाने वाला।’
सियासत से ऊपर रिश्ते
पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य सूर्यकुमार बताते हैं, ‘मैं चंद्रशेखर जी के साथ रहता था। एक घटना तो उस समय की है जब जनता दल की सरकार बनने पर विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री थे। सत्ता की चमक-दमक में जनता दल के कुछ नेता बदल गए और चंद्रशेखर जी को हाशिए पर डालने की कोशिश शुरू हो गई। टकराव हो गया।
तमाम लोग बदल गए। मुलायम सिंह चाहते तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के मोह में यह खतरा न लेते लेकिन उन्होंने सियासत पर रिश्तों को तरजीह दी।’ मुख्यमंत्री पद की चिंता छोड़ मुलायम ने कहा, ‘मैं चंद्रशेखर के साथ हूं और रहूंगा। जो लोग चंद्रशेखर जी का विरोध कर रहे हैं वे ठीक नहीं कर रहे हैं।
मुलायम के खुलकर सामने आने का ही नतीजा रहा कि जनता दल के 144 सांसदों में 62 चंद्रशेखर के पक्ष में खड़े हो गए। चंद्रशेखर जी के निधन के बाद जब उनके परिवार पर निजी हमले शुरू हुए तो मुलायम सिंह उनके साथ पार्टी की सीमाओं से बाहर आकर खड़े हुए। उन्होंने हम लोगों को पार्टी में लेकर सम्मानजनक स्थान दिया और चंद्रशेखर जी के परिवार से आज भी रिश्ते निभा रहे हैं।’
समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और मुलायम के पुराने साथी लखनऊ निवासी चौधरी जगदीप सिंह यादव बताते हैं, ‘1990 की बात होगी। खास बात यह है कि नेता पद को लेकर चौधरी अजित सिंह द्वारा मुलायम सिंह यादव के विरोध की घटना घट चुकी थी।
सरकार में मंत्री शतरुद्र प्रकाश ने संगठन की एक बैठक में नेताजी के सामने चौधरी चरण सिंह की विधानभवन में प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। हम लोग सोचने लगे कि अजित सिंह के व्यवहार से आहत नेताजी शायद इन्कार कर दें।
पर, नेताजी का जवाब सुनने वाला था, ‘ यह सुझाव देने में इतना समय क्यों लगा दिया।’ 24 मई 1990 को प्रतिमा का अनावरण भी हो गया। यही नहीं, नेताजी ने आगे बढ़कर मेरठ विश्वविद्यालय का नाम भी चौधरी चरण सिंह के नाम पर रखने की घोषणा की।
बहादुर और बेखौफ
विधान परिषद के पूर्व सभापति चौधरी सुखराम सिंह यादव बताते हैं, ‘मुझे वर्ष तो नहीं याद है। पर, मौका माधोगढ़ (जालौन) सीट के विधानसभा उप चुनाव का था। मेरे पिता और मुलायम सिंह के मित्र चौधरी हरमोहन सिंह वहां चुनाव प्रचार कर रहे थे। मैं भी साथ में था।
उन दिनों रात-रात भर गांवों में जाकर लोगों से मिलने-जुलने और वोट मांगने की परंपरा थी। हम लोग एक गांव से निकलकर दूसरे गांव जा रहे थे। रात का वक्त था। कुठवन के पास एक गांव में फायरिंग की आवाज सुनाई दी। ‘नेताजी’ ने मुझसे कहा कि जीप गांव की तरफ ले चलो।
शायद, डकैती पड़ रही है। उन्होंने पड़ोस के गांव के कुछ लोगों को भी जगवाया। हम सभी लोग उस गांव के पास पहुंचे। नेताजी सबसे आगे। गांव से थोड़ा पहले रुककर उन्होंने डकैतों को ललकारा तो उधर से हम लोगों पर फायरिंग हुई। पर, नेताजी पूरी तरह बेखौफ। आखिरकार, डकैतों को गांव से भागना पड़ा। गांव वाले सभी लोग सुरक्षित बच गए।’
समाजवादी पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य निर्मल सिंह भी एक ऐसी ही घटना का उल्लेख करते है, ‘वर्ष ठीक-ठीक तो याद नहीं है, लेकिन बात चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद की है। इटावा में चौधरी साहब की रैली थी। नेताजी रैली की तैयारियों में जुटे थे।
एक दिन उन पर जबरदस्त हमला हो गया। चौधरी साहब की रैली की तैयारियों के सिलसिले में हम लोग भी वहीं पर थे। भाग कर मौके पर पहुंचे। देखा, नेताजी निश्चिंत भाव से बेखौफ और रैली की तैयारियों का निर्देश दे रहे हैं।
हममे से कुछ लोगों ने उनसे थोड़ी देर आराम करने और सुरक्षा को लेकर चिंता जताई।’ उनका जवाब सुनने वाला था, ‘मौत से क्या डरना और घबराना। मौत कभी किसी के रोके रुकी है।
जब होनी होती है तो हो ही जाती है। इसलिए निश्चिंत होकर अपने-अपने काम में लगो और रैली की तैयारी करो। रैली हर हाल में सफल होनी चाहिए।’