यूपी काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (यूपीसीएसटी) के माध्यम से वैज्ञानिकों को प्रेरित करने के लिए हर साल विज्ञान अवॉर्ड दिए जाते हैं।
आलम यह है कि 2011 के बाद यह अवॉर्ड वितरण नहीं किया जा सका। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय का प्रभार अपने पास रखने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास इन पुरस्कारों को बांटने का वक्त नहीं है।
पुरस्कार पाने वालों के नाम अगस्त में ही प्रमुख सचिव डॉ. हरशरण दास की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति फाइनल कर चुकी है। सर्टिफिकेट और ट्रॉफी भी तैयार हैं।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने मुख्यमंत्री से समय लेने की फाइल भी पंचम तल भेज दी। लेकिन तीन महीने से समय नहीं मिल पाया।
अफसरों के मुताबिक राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के मौके पर ये अवॉर्ड दिए जाने थे। कार्यक्रम नहीं होने के चलते अब फिर से यह बांटे नहीं जा सकेंगे।
आठ साल बीते, केवल 37 पेटेंट फाइल
वैज्ञानिक विकास और प्रमोशन केऊपर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने वाले यूपीसीएसटी को नई तकनीकी आविष्कारों का पेटेंट कराने का जिम्मा सौंपा गया।
इसके लिए एक पेटेंट सेल भी खोला गया। इसकी जिम्मेदारी एक वैज्ञानिक अधिकारी को दी गई। इनका काम शैक्षिक संस्थानों के अलावा रिसर्च सेंटरों में हुए शोध और तकनीकी विकासों को पेटेंट कराना था।
2006 में शुरू हुई कवायद के बाद उपलब्धि के नाम पर कुछ खास नहीं है। बहरहाल यूपीसीएसटी के अफसरों का कहना है कि हमने पेटेंट के प्रति शोधकर्ताओं को जागरूक करने में सफलता पाई है।
आंकड़ों की बात करें तो पिछले आठ बरसों में यूपी के 70 जिलों से केवल 37 पेटेंट ही यहां फाइल हुए।
अफसरों का इस पर कहना है कि उनका काम पेटेंट देना नहीं है। वे केवल एक माध्यम हैं।
पेटेंट को फाइल कराने के बाद सॉफ्टवेयर से सर्च कर पहले से मौजूद शोध और तकनीक से मिलान करने और फॉर्म भराने का काम काउंसिल में किया जाता है।
पेटेंट का काम तेज करने के लिए अब छह शहरों की यूनिवर्सिटी में पेटेंट सेल खोले गए हैं। इनमें लखनऊ यूनिवर्सिटी के अलावा मेरठ, इलाहाबाद, बरेली, झांसी और फैजाबाद की यूनिवर्सिटी शामिल हैं।
1992 से प्रमोशन के इंतजार में साइंटिस्ट
वैज्ञानिक विकास के लिए जरूरी है कि साइंटिस्ट को काम करने का माहौल मिले। ब्यूरोक्रेसी के तले दबे वैज्ञानिक खुद के लिए यह माहौल ही नहीं पा रहे।
एक तरफ प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए बजट की किल्लत तो दूसरी तरफ उन्हें प्रेरित करने के लिए पहल की कमी है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से जुड़ी संस्थाओं में 1992 के बाद से वैज्ञानिकों को कोई प्रमोशन नहीं मिला।
एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि इस बारे में बात करने पर वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट ही सही तरीके से पेश नहीं आते।
केंद्र सरकार की डीएसटी-स्ट्रेंथनिंग ऑफ काउंसिल योजना में वैज्ञानिकों की बेहतरी के लिए कवायद शुरू की जानी थी। इसके लिए विभाग के प्रमुख सचिव की अनुमति मिलने के बाद समिति भी बनाई गई।
केजीएमयू के प्रोफेसर विश्वजीत सिंह की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट भी दे दी। लेकिन सिफारिशों को अब तक लागू नहीं किया जा सका।
सीएम अप्रूवल दें तो बंटे साइंस अवार्ड
डॉ. हरशरण दास, प्रमुख सचिव, विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी का कहना है कि वैज्ञानिकों के प्रमोशन की प्रक्रिया को तेज किया गया है।
प्रमोशन के लिए जो एंट्रीज वैज्ञानिकों ने की हैं उनमें काफी कमियां हैं। उल्टे-सीधे तरीके से एंट्री की गई। प्रमोशन की प्रक्रिया एकदम नहीं होती।
इसे पारदर्शिता के साथ किया जाएगा, ऐसे ही किसी को भी प्रमोशन नहीं दिया जा सकता। प्रशासनिक अधिकारी अपना काम कर रहे हैं।
साइंस अवार्ड के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय से अप्रूवल मिलना है। इसके मिलते ही अवार्ड की घोषणा कर पुरुस्कार एक कार्यक्रम में दिए जाएंगे।
डॉ. आनंद अखिला, पूर्व वैज्ञानिक, सीएसआईआर-सीमैप का कहना है कि वैज्ञानिक संस्थाएं बजट की कमी से जूझ रही हैं। शोध की गुणवत्ता अच्छी नहीं।
जून 2012 में यूपीसीएसटी ने विज्ञान पुरस्कार दिए जाने का विज्ञापन दिया। 21 महीने बीत जाने के बाद भी इन पुरस्कारों की घोषणा नहीं की गई।
संबंधित फाइल इधर-उधर भटक रही है। विज्ञान और वैज्ञानिक को जो दर्जा समाज में मिलना चाहिए वो नहीं मिला है। वैज्ञानिक विकास के लिए इसकी जरूरत है।