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फंड न मिला तो दो करोड़ हो जाएंगे बेरोजगार

Sat, 28 Jun 2014 08:40 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण पहले से ही बेरोजगारी है लेकिन अगर फंड न मिला तो दो करोड़ और बेरोजगार हो जाएंगे। जी हां, प्रदेश में करीब 1.48 करोड़ मनरेगा जॉब कार्ड धारक हैं।
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इन कार्डों पर मजदूरी करने वाले श्रमिकों की तादाद करीब दो करोड़ है। प्रदेश का करीब 5160 करोड़ रुपये बजट में हिस्सा बनता है।

मगर वित्तीय वर्ष 2014-15 की पहली तिमाही पूरी होने में अब जबकि केवल तीन दिन बचे हैं और केंद्र से सिर्फ 232.84 करोड़ रुपये ही मिल पाए हैं।

नतीजा ये है कि जिन परिवारों का मनरेगा के भरोसे गुजर-बसर होता है, उनके कमाऊ सदस्यों के पलायन का खतरा बढ़ गया है। वहीं पिछले साल की बात करें तो जून तक 1469 करोड़ रुपये केंद्र से मिल गए थे।

मोदी सरकार ने जानी दिक्कतें

प्रदेश में मनरेगा पिछले कई सालों से केंद्र व राज्य के बीच सियासत की वजह बनती रही है। केंद्र में नई सरकार बनने के बाद प्रदेश के मजदूरों को भी उम्मीद थी कि सरकार इस योजना को लेकर जल्द से जल्द अपना रुख साफ करेगी। पर, इस तस्वीर में फिलहाल कोई बदलाव नहीं आया है।

प्रदेश में ग्राम्य विकास विभाग के अलावा दस अन्य विभाग मनरेगा योजना के अंतर्गत काम कराते हैं। अधिकारी बताते हैं कि नई सरकार ने राज्यों के सुझाव पर मनरेगा की कुछ जमीनी विसंगतियों का संज्ञान लिया है।

उसमें वह संशोधन कर इस योजना को आगे बढ़ाना चाहती है। यह अच्छा संकेत है। यूपीए सरकार में कई बार चर्चा के बावजूद यह बात समझने की कोशिश नहीं की गई थी।

पर, इसमें जितना देर हो रहा है उतनी ही मुश्किल राज्य के सामने बढ़ती जा रही है।

ये हैं मनरेगा की मुश्किलें

मुश्किल एक--काम नहीं तो बेरोजगारी भत्ता देना होगा
नियमानुसार श्रमिकों को योजना के अंतर्गत काम मांगने का अधिकार है। यदि उन्हें काम नहीं मिल रहा है तो वे बेरोजगारी भत्ता मांगने के हकदार होंगे। केंद्र सरकार ने प्रदेश को बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान लागू करने का दबाव बढ़ाया हुआ है।

मुश्किल दो--काम दे दिया, समय पर दाम नहीं तो विलंबित भुगतान
सरकार ने यदि बजट मिलने की प्रत्याशा में काम दे दिया और समय से बजट न मिलने की वजह से मजदूरी नहीं दे पाई तो नियमानुसार उसे विलंबित भुगतान देना होगा। प्रदेश में यह प्रावधान भी इसी वित्तीय वर्ष से लागू करने की कार्रवाई चल रही है।

मुश्किल तीन--काम नहीं तो पलायन का खतरा
मजदूरों को काम मांगने पर समय से काम न मिलने पर उनके पलायन का खतरा बढ़ जाता है। वजह, बड़ी तादाद में परिवार हैं जिनका परिवार मनरेगा पर निर्भर कर रहा है। काम न मिलने पर उन्हें मजबूरी में मजदूरी के लिए बाहर जाना पड़ेगा।

तो होंगी इस तरह की दिक्कतें

मुश्किल चार--कई काम तो हो ही नहीं पाएंगे
बरसात शुरू होने वाली है। वन विभाग मनरेगा की मदद से पौधरोपण व उद्यान विभाग मौसम आधारित कई काम कराता है। बरसात बीती और बजट पर्याप्त नहीं मिला तो फिर यह काम आगे नहीं हो पाएगा।

मुश्किल पांच--कर्मचारियों के मानदेय के पड़ जाएंगे लाले
मनरेगा के अंतर्गत ब्लॉक व जिला स्तर पर बड़ी संख्या में रोजगार सेवक, तकनीकी सहायक, एकाउंटेंट, एपीओ, कंप्यूटर आपरेटर कार्यरत हैं। सोशल ऑडिट का काम भी होता है।

कर्मियों का मानदेय व सोशल आडिट पूरी तरह से मनरेगा बजट पर निर्भर करता है। विभागीय जानकार बताते हैं कि जब काम ही नहीं होगा तब प्रशासनिक मद कैसे जेनेरेट होगा और फिर मानदेय कैसे मिलेगा।
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2500 करोड़ रुपये की जरूरत

इस पर ग्राम्य विकास के सचिव अरुण सिंघल का कहना है कि भारत सरकार से इस वित्त वर्ष में अभी बहुत कम बजट मिल सका है जिसकी वजह से समस्याएं आ रही हैं। प्रदेश को अब तक करीब 2500 करोड़ रुपये मिल जाने चाहिए।

मिले हैं केवल 232.84 करोड़। शासन को इस बात का भी एहसास है कि यदि राज्य में सूखे की स्थिति बनती है तो प्रदेश में ज्यादा काम कराने पड़ेंगे।

केंद्र से प्रदेश के हिस्से का बजट तत्काल नियमानुसार जारी करने का आग्रह किया गया है। मुख्यमंत्री भी पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वह इस संबंध में केंद्र सरकार को पूरी स्थिति की जानकारी देकर तत्काल एकमुश्त बजट आवंटन का आग्रह करेंगे।
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