राज्यपाल राम नाईक ने कहा है कि मिर्जा गालिब उर्दू के शिखर पुरुष थे। उनकी लोकप्रियता हिमालय से ऊंची है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति चला जाता है लेकिन उसका साहित्य अमर हो जाता है। यही वजह है कि आज 150 साल बाद भी गालिब लोगों की जुबान पर हैं। आज भी उनके साहित्य, उनके शेर पर विद्वानों के बीच चर्चा होती है। वे लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय हाल में गालिब इंस्टीट्यूट दिल्ली, उर्दू राइटर्स फोरम व उर्दू विभाग द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि गालिब का एक-एक शेर ऊर्जा देता है। भाषाएं एक-दूसरे को जोड़ने का काम करती हैं। हिंदी-उर्दू सगी बहने हैं। उर्दू का आजादी के संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उर्दू में जोश-जज्बा है। कभी-कभी कष्ट होता है कि मैं चाहकर भी वैसा जज्बा नहीं पैदा कर पाता हूं। राज्यपाल ने अपनी पुस्तक चरैवेति-चरैवेति का जिक्र करते हुए कहा कि मेरे में भी गालिब का एक अंश है। उन्होंने प्रयाराज में कुंभ के सकुशल संपन्न होने की भी चर्चा की।
गालिब आज भी हमारे बीच में मौजूद
कुलपति प्रो. एसपी सिंह ने कहा कि राज्यपाल अपनी लेखनी, मन, काम से साहित्यकार हैं। आज जब वो विश्वविद्यालय आए हैं तो यह एक बहार जैसे है। गालिब से, उनके साहित्य से बहुत कुछ सीखा-समझा जा सकता है। गालिब इंस्टीट्यूट के निदेशक सैय्यद रजा हैदर ने कहा कि गालिब आज भी हमारे बीच में मौजूद हैं। वे समाज, सभ्यता व संस्कृति के द्योतक हैं। उनका लखनऊ के साथ इलाहाबाद और बनारस से भी गहरा नाता था।
गालिब की शायरी अपनेपन का एहसास कराती है
उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. अब्बास रजा हैदर ने कहा कि गालिब की शायरी अपनेपन का एहसास कराती है। उन्होंने हमेशा इंसान और इंसानियत के बारे में बाते कही हैं। उन्होंने बताया कि दो दिवसीय सेमिनार में आए पेपर व चर्चाओं को एक किताब के रूप में प्रकाशित किया जाएगा। इस अवसर पर गालिब इंस्टीट्यूट के सचिव प्रो. शफीकुर्रहमान, प्रो. शारिक रुदौलवी, डॉ. इदरीश आदि उपस्थित थे।