यह भी माना जा रहा है कि पुराने नेताओं के बजाए भाजपा ने एक युवा को मैदान में उतारकर दलित समाज के युवा वर्ग को साधने की भी कोशिश की है। चूंकि लोकसभा चुनाव से ही भाजपा सपा सांसद अवधेश प्रसाद की उम्र को लेकर सियासी तीर चलाती रही है। इसलिए भाजपा ने अपने उम्रदराज नेताओं की दावेदारी को किनारे करके चंद्रभानु को तरजीह दी है। कहा जा रहा है कि चंद्रभानु का युवा वर्ग पर अच्छा प्रभाव है और लगातार वह दो साल से युवाओं के बीच काम भी कर रहे हैं। इसलिए उपचुनाव में दलित युवाओं को साधने में मदद मिलेगी।
अवधेश प्रसाद के खिलाफ लड़ चुके हैं बाबा गोरखनाथ।
- फोटो : अमर उजाला।
अयोध्या के चौतरफा विकास के बाद भी लोकसभा सीट हारने से भाजपा के लिए अहम बनी इस सीट को जीतने में भाजपा को कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा। माना जा रहा है कि इस चुनाव में भी भाजपा को जहां संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने जैसे विपक्षी तुक्का पर स्थिति साफ करनी होगी। वहीं, टिकट न मिलने से नाराज अपने ही लोगों के भितरघात से निजात पाना बड़ी चुनौती होगी। हालांकि प्रमुख दावेदारों में शामिल रहे पूर्व विधायक गोरखनाथ बाबा ने पार्टी के फैसले का समर्थन तो किया है, लेकिन यह भी कहा है कि प्रभु श्रीराम भी राजगद्दी गंवाने के बाद जब वन की तरफ जा रहे थे, तब मुस्करा रहे थे। हम भी उन्हीं की दिखाई राह पर चलेंगे। उनके इस बयान के भी निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।
सूत्रों की माने तो टिकट जारी होने के एक दिन पहले तक चुनाव लड़ने के लिए सरकारी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का आवेदन करने वाले सुरेंद्र रावत की दावेदारी सबसे ऊपर थी, लेकिन उच्च स्तर से आए एक फोन से सुरेंद्र की सारी कवायद पर पानी फेर दिया। सुरेंद्र को टिकट दिलाने के लिए कई दिग्गज नेता जुटे थे। हालांकि माना जा रहा है कि टिकट से वंचित सुरेंद्र को पार्टी में कोई महत्वपूर्ण पद देकर समायोजित किया जाएगा।
कुल मतदाता 3.5 लाख
55 हजार पासी, 1.2 लाख अन्य दलित (कोरी आदि), 55 हजार यादव, 60 हजार ब्राम्हण, 30 हजार मुस्लिम, 25 हजार क्षत्रिय, 50 हजार अन्य पिछड़ी जाति