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मेरठ रैली में मोदी नहीं, बोलेगा 'मुजफ्फरनगर'

Wed, 29 Jan 2014 12:13 PM IST
अखिलेश बाजपेई/अमर उजाला, लखनऊ
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मेरठ में 2 फरवरी को होने जा रही मोदी की विजय शंखनाद रैली कई मामलों में अब तक हो चुकी रैलियों से अलग होगी।
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यह रैली भीड़ की कसौटी पर ही नहीं कसी जाएगी बल्कि मुजफ्फरनगर की तपिश और सियासत पर उसके प्रभाव के असर के रूप में भी देखी जाएगी।

रैली से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा व मोदी की हवा के संकेत व दिशा की जानकारी तो मिलेगी ही वहीं पूरे प्रदेश की सियासी बयार का रुझान भी पता चलेगा।

अब तक हुई रैलियों में भाजपा ही आमतौर पर पांच से सात लाख लोगों की भीड़ जुटाने का दावा करती रही है। इस लिहाज से भाजपा को इस रैली में इससे ज्यादा भीड़ जुटाना होगा।

वैसे भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश अन्य क्षेत्रों की तुलना में भाजपा के लिए अपेक्षाकृत रूप से काफी उपजाऊ रहा है। इस समय भी पार्टी के कुल 47 विधायकों में सबसे ज्यादा 12 विधायक इसी क्षेत्र से जीतकर आए हैं।
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भाजपा के कुछ प्रमुख नेता इसी क्षेत्र से चुनकर आते हैं तो कुछ यहीं केरहने वाले हैं। प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी मेरठ से विधायक हैं।

तो विधान मंडल दल के नेता हुकुम सिंह भी इसी क्षेत्र के मुजफ्फरनगर जिले के कैराना से विधायक हैं। भाजपा के संगठनात्मक ढांचे की देखरेख करने वाले प्रदेश महामंत्री (संगठन) राकेश कुमार भी इसी क्षेत्र के हैं।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी पश्चिमी क्षेत्र में आने वाली लोकसभा की गाजियाबाद सीट से सांसद हैं। स्वाभाविक है कि रैली में जुटने वाली भीड़ इन सब नेताओं की पहुंच व पकड़ की कसौटी बनेगी।

जाटों-गूजरों सहित हिंदुत्व की लामबंदी का असर : पिछले कई महीनों से मुजफ्फरनगर दंगे की आंच की तपिश पश्चिमी उत्तर प्रदेश और सूबे की सियासत को तो रह-रहकर गरमाती ही रही है।

कई मौकों पर देश की राजधानी दिल्ली में भी मुजफ्फरनगर की आंच महसूस की गई है। रैली में भीड़ और उसके तेवर बताएंगे कि उनके दिल व दिमाग और सियासी रुझान पर मुजफ्फरनगर की घटना का प्रभाव बरकरार है।

या उसका असर धीरे-धीरे कम हो रहा है। पश्चिम के सामाजिक समीकरणों और मुजफ्फरनगर की घटना से जुड़े प्रसंगों पर नजर दौड़ाएं तो जाट, गूजर, क्षत्रिय सहित कई जातियों का मन भी इस रैली के साथ सामने आएगा।

पता चलेगा कि मुजफ्फरनगर की तपिश में भाजपा पश्चिम में सियासत की दिशा और चुनाव में पार्टियों का भाग्य तय करने वाली इन जातियों को अपने पक्ष में लामबंद करने में कहां तक कामयाब हुई है।

यह देखना होगा दिलचस्प
सूबे में सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी की तरफ से मुजफ्फरनगर दंगा में नरेन्द्र मोदी से लेकर अमित शाह की भूमिका को आरोपित किया जाता रहा है।

साथ ही यह आरोप भी लगे हैं कि मोदी और शाह के गुंडों ने मुजफ्फरनगर दंगा कराया है। पर, मोदी अभी तक हुई छह रैलियों में आमतौर पर मुजफ्फरनगर के मुद्दे को तूल देने से बचते रहे हैं।

पर, अब उनकी रैली वहां होने जा रही है जहां पिछले कई महीने से यह दोनों तत्व राजनीति को प्रभावित करते आ रहे हैं।

मुजफ्फरनगर की घटना में भाजपा के दो विधायकों संगीत सोम और सुरेश राणा की गिरफ्तारी हुई और उन पर रासुका लग चुकी है।

भाजपा के प्रदेश नेता मुजफ्फरनगर की घटना को लेकर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार पर हिंदुओं के उत्पीड़न का आरोप लगाते रहे हैं।

इसलिए अब जब मोदी इसी जमीन पर रैली में आ रहे हैं तो देखने वाली बात यह होगी कि मोदी यहां भी पुराना ही रुख रखते हैं या अपने तेवरों को मुजफ्फरनगर की तपिश से कुछ धार भी देते हैं।

अपने ही पैमाने पर भाजपा की परीक्षा : मेरठ रैली में भाजपा के अपने पैमाने भी परीक्षा लेने वाले हैं। दरअसल, आगरा में 21 नवंबर को हुई रैली से ठीक पहले ही पार्टी के विधायक संगीत सोम रिहा होकर बाहर आए थे।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने सोम का आगरा की रैली में मोदी के हाथों सम्मान कराने की घोषणा कर दी।

पर, रैली वाले दिन मोदी और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजनाथ सिंह मंच पर तब आए जब सोम को पगड़ी और माला पहनाकर मंच से हटा दिया गया।

काफी दिन तक यह चर्चा रही कि मोदी और राजनाथ सहित केंद्रीय नेतृत्व नहीं चाहता कि मुजफ्फरगर की घटना को तूल दिया जाए।

पर, अब जब रैली उस इलाके में होने जा रही है जो खुद भी मुजफ्फरनगर की आग से झुलसा है। मुजफ्फरनगर मामले में जेल में बंद रहे  पार्टी विधायक संगीत सोम व सुरेश राणा भी यहीं के हैं।
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सिर्फ विधायक ही नहीं बल्कि भाजपा व संघ परिवार के कई कार्यकर्ताओं को मुजफ्फरनगर के चलते जेल जाना पड़ा। ऐसे इलाके में मोदी का इन विधायकों को लेकर रुख और उनके भाषण के तेवर देखने वाले होंगे।
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