उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी में आयोजित संगोष्ठी में मौजूद वक्ता। स्वयं
उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी की ओर से इंदिरा भवन स्थित कार्यालय में बुधवार को ‘गुरमति साहित्य में कबीर की वाणी एवं सामाजिक समरसता‘ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। विद्वानों ने कबीर के साहित्य को समाज सुधार और समरसता का संदेश देने वाला बताया।
डॉ. दलबीर सिंह ने कहा कि गुरमति साहित्य का मूल उद्देश्य मानवता को एकता, समानता और ईश्वर की भक्ति का संदेश देना है। इस साहित्य का आधार गुरुग्रंथ साहिब है, जिसमें केवल सिख गुरुओं की ही नहीं, बल्कि संतों और भक्त कवियों की वाणियां भी संकलित हैं। उन भक्तों में कबीर की वाणी को विशेष स्थान प्राप्त है। उनकी वाणी न केवल आध्यात्मिक गहराई लिए हुए है, बल्कि उसमें सामाजिक सुधार और समरसता की भी स्पष्ट झलक मिलती है। सरदार नरेंद्र सिंह मोंगा ने कहा कि कबीर अपने समकालीन समाज के विभाजन को पाटने वाले एक आध्यात्मिक गुरु थे। ‘ढाई आखर प्रेम का‘ पढ़ाकर कबीर भारत के सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक परिवेश में बहुत बड़ा परिवर्तन ले लाए।
त्रिलोक सिंह ने कहा कि कबीर निर्गुण भक्ति के प्रवर्तक माने जाते हैं। कबीरा खड़ा बाजार में, सबकी मांगे खैर...ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर... से माध्यम से उन्होंने समाज में व्याप्त ऊंच-नीच की भावना का विरोध किया। अजय पाण्डेय ने कहा कि कबीर की वाणी ने गुरमति साहित्य को सामाजिक दृष्टि से समृद्ध किया है। डॉ. रश्मि शील ने कहा कि कबीर की वाणी ने गुरमति दर्शन को और अधिक लोक उपयोगी और सामाजिक रूप से जागरूक बनाया। अकादमी निदेशक ओम प्रकाश सिंह, अरविंद नारायण मिश्र, मीना सिंह, अंजू सिंह आदि मौजूद रहे।