भले ही महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजे प्रत्यक्ष तौर पर यूपी के लिए बहुत मायने न रखते हों लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से ये काफी अहम दिख रहे हैं। इन नतीजों से यूपी की राजनीति के मिजाज को भी भांपा जा सकता है। मोटे तौर पर देखें तो ये नतीजे भाजपा को नसीहत देने वाले हैं तो सपा व बसपा को चेतावनी देने वाले भी।
वहीं, उत्तर प्रदेश विधानसभा की सीट कैराना पर भाजपा की हार उसे ईमानदारी से आत्ममंथन और यूपी में जमीनी स्थिति को स्वीकार करने की हिदायत दे रही है।
नतीजों ने भाजपा की भविष्य की रणनीति व राजनीति की ओर भी इशारा कर दिया है। महाराष्ट्र में शिवसेना से अलग होकर चुनाव लड़ी भाजपा को जिस तरह अपने इस पुराने सहयोगी से लगभग दोगुनी सीटें मिली हैं, हरियाणा में कुलदीप विश्नोई से गठबंधन तोड़ने के बावजूद उसे बहुमत मिला, उससे उसका उत्साह बढ़ना स्वाभाविक है।
वह धीरे-धीरे गठबंधन की राजनीति से पिंड छुड़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। वह 2017 में उप्र विधानसभा का चुनाव अपने बल पर लड़ेगी। वैसे यहां उसका गठबंधन सिर्फ अपना दल से है। पर, नतीजों और भाजपा के दोनों राज्यों में फैसलों ने अपना दल को भी चेतावनी दी है। अपना दल यदि बहुत महत्वाकांक्षा पालेगा तो उसे भी निराशा हाथ लगेगी।
विरोधी वोटों में बंटवारे पर जोर
महाराष्ट्र व हरियाणा के नतीजों पर नजर दौड़ाएं तो भाजपा को सबसे अधिक फायदा विरोधी मतों में बंटवारे का मिला है। स्वाभाविक रूप से भाजपा की रणनीति अब यूपी में भी विरोधी वोटों में बंटवारे पर पूरा ध्यान देने की होगी। यूपी में कांग्रेस का आधार तो बहुत ज्यादा बचा नहीं, अलबत्ता वह सपा और बसपा के वोटों को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास करेगी। प्रदेश में भाजपा विरोधी वोट मुख्यत: तीन हिस्सों में बंटे दिख रहे हैं। एक सपा का है तो दूसरा बसपा का और बचा-खुचा कांग्रेस का।
हालांकि, राजनीति में किसी संभावना को अंतिम रूप से खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन सपा और बसपा नेतृत्व के बीच जिस तरह की तल्खी है, उसके चलते दोनों में तालमेल की संभावना दूर-दूर तक नहीं दिखती। रही बात कांग्रेस की तो वह भी शायद ही किसी के साथ गठबंधन के रूप में लड़ने को तैयार हो। वह तैयार हो भी जाए तो दूसरे उसे शायद ही अपनाएं।
पुराने समीकरणों की पुनरावृत्ति मुश्किल: एक तर्क यह भी हो सकता है कि 2007 व 2012 में क्रमश: बसपा और सपा की सरकार इन पार्टियों को अपने दम पर मिले वोटों के आधार पर बनी थी। पर, ध्यान रहे कि 2007 में बसपा और 2012 में सपा को अपने परंपरागत वोट के अलावा दूसरे मतदाताओं ने तत्कालीन प्रदेश सरकार से त्रस्त होकर वोट दिया था। सपा सरकार के कामकाज व खराब कानून-व्यवस्था से त्रस्त होकर ये मतदाता 2007 में बसपा के साथ खड़े हुए तो बसपा सरकार के कारनामों व घोटालों से आजिज आकर 2012 में सपा के साथ। आज हालात काफी बदल गए हैं। तब भाजपा हाशिए पर थी।
लोगों को उम्मीद नहीं थी कि भाजपा भी सूबे में सरकार बना सकती है। केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल करके सरकार बनाई है। इस नाते वह 2017 में लोगों के सामने मजबूत विकल्प के रूप में रहेगी। उसे केंद्र में सरकार होने का भी लाभ मिल सकता है।
सपा को बड़ा सबक
लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र व हरियाणा के नतीजों ने साफ कर दिया कि देश में न सिर्फ कांग्रेस विरोधी, बल्कि सत्ता विरोधी हवा भी चल रही है। जाहिर है, उप्र में 2017 के चुनाव में सपा को अपनी सरकार के कामकाज के आधार पर ही जनता के बीच जाना पड़ेगा। इस नाते इन नतीजों ने उसे भी आगाह किया है कि वह सबक ले।
विधानसभा चुनाव में लगभग ढाई साल का वक्त है। वह जनता के मूड को समझकर सत्ताविरोधी हवा को थामने की कोशिश करे। अगर सपा ऐसा नहीं कर पाई तो चुनाव में मुश्किलें पेश आएंगी।
पर, सोचना तो भाजपा को भी होगा: ऐसा नहीं है कि इन नतीजों ने भाजपा को कुछ समझाने की कोशिश नहीं की। खासकर कैराना में हुकुम सिंह जैसे बड़े नेता के घर की सीट पर मिली हार ने यह साबित कर दिया है कि प्रदेश भाजपा नेताओं के पास न तो अपनी रणनीति है, न ताकत। यहां के नेताओं को लोकसभा चुनाव के नतीजों पर बहुत इतराने की जरूरत नहीं है। उपचुनाव में पहले अपनी 11 सीटों में से आठ पर करारी हार और अब कैराना में शिकस्त सामान्य बात नहीं है।
यह वह सीट है जहां से हुकुम सिंह सात बार विधायक चुने जाते रहे। इस समय वह यहीं से सांसद हैं। भाजपा से चुनाव लड़ने वाले अनिल कुमार रिश्ते में उनके भतीजे हैं। जाहिर है, भाजपा अगर सिर्फ मोदी के जादू के ही सहारे बैठी रही तो 2017 में उसकी स्थिति बेहतर भले हो जाए लेकिन अपने दम पर सरकार बनाना बहुत मुश्किल होगा।