मान्यता प्राप्त और अनुदानित मदरसों में दस साल तक फर्जीवाड़ा होता रहा और निजाम सोता रहा। इनमें 16 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान तो सिर्फ शिक्षकों के वेतन पर किया गया है। छात्रों के वजीफे के रूप में भी करोड़ों रुपये डकारे गए। आजमगढ़ का मामला सामने आने के बाद अब हलचल मची है। एसआईटी की जांच का अध्ययन कर जल्द ही इस पर निर्णय लेने की तैयारी की जा रही है।
आजमगढ़ में मान्यता प्राप्त मदरसों की जांच एसआईटी ने की तो सामने आया कि 219 मदरसे सिर्फ कागजों में ही चल रहे थे। 39 मदरसे तो ऐसे अनुदानित रहे जिन्हें सरकारी भुगतान भी किया गया। इनमें से अधिकतर मदरसों को मान्यता वर्ष 2003 से 2005 के बीच दी गई। वर्ष 2017 में एसआईटी को जांच मिलने के बाद भुगतान आदि पर रोक लगाई गई। दस साल से ज्यादा यह खेल चला।
एसआईटी ने अब अपनी जांच शासन को सौंप दी है। अगर जांच में 39 अनुदानित मदरसों की ही बात करें तो इनमें प्रत्येक शिक्षक को एक साल में 1.44 लाख रुपये का भुगतान किया जाता है। एक मदरसे में तीन शिक्षक होते हैं। इस तरह एक मदरसे में 43.20 लाख रुपये प्रति वर्ष दिए गए। इस तरह दस साल में करीब 16 करोड़ रुपये से ज्यादा शिक्षकों को बतौर मानदेय दिए गए। इसके अलावा बच्चों को वजीफा भी बांटा गया।
वजीफा अन्य सभी फर्जी मदरसों में भी बांटा। यह सारा खेल कागजों में ही हुआ। अहम सवाल यह है कि सत्यापन के बाद ही मदरसों को बजट देने के निर्देश के बावजूद बजट जारी होता रहा। इससे साबित होता है कि सत्यापन भी फर्जी हुआ। फर्जी सत्यापन का डाटा पोर्टल पर भी अपलोड किया गया।
अन्य जिलों में भी हो सकती है जांच
मिर्जापुर में भी इसी तरह की जांच चल रही है। साथ ही अन्य कई जिलों में जांच शुरू हो सकती है। अपर मुख्य सचिव अल्पसंख्यक विभाग मोनिका गर्ग के मुताबिक एसआईटी की पूरी रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है। उसके बाद ही निर्णय लिया जाएगा। एसआईटी ने इस प्रकरण में संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की भी संस्तुति की है।