लखनऊ विश्वविद्यालय ने 19 से 25 नवंबर के बीच अपना शताब्दी वर्ष समारोह सीमित दायरे में भी भव्यता से मनाया। इसके लिए लविवि प्रशासन को तारीफ तो मिली, लेकिन जिसकी उम्मीद थी वह नहीं मिला। आर्थिक तंगी से जूझ रहे लविवि को आशा थी कि शताब्दी समारोह के दौरान उसकी खाली झोली भरने के लिए कुछ घोषणाएं हो सकती हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
लविवि ने समारोह से पहले अपनी खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए राज्य सरकार को 50 करोड़ रुपये और केंद्र सरकार को 100 करोड़ रुपये का प्रस्ताव भी भेजा था। लेकिन इसके बावजूद कहीं से आर्थिक सहायता न मिलने से लविवि की आगे की योजना प्रभावित होना तय है।
लविवि का अनुदान फ्रीज होने के कारण उसे सिर्फ 34 करोड़ रुपये ही मिलते हैं। इसमें से 10 करोड़ रुपये विभिन्न टैक्स के माध्यम से सरकार को वापस हो जाते हैं। इस समय लविवि को अकेले वेतन मद में 180 करोड़ रुपये खर्च करना होता है।
यह खर्च विद्यार्थियों से मिली फीस से ही निकलता है। अपनी स्थापना के सौवें साल में लविवि ने आर्थिक सहायता के लिए 100 करोड़ रुपये का प्रस्ताव केंद्र तथा 50 करोड़ रुपये का प्रस्ताव प्रदेश सरकार को भेजा था।
लविवि ने 19 से 25 नवंबर के बीच होने वाले मुख्य कार्यक्रम में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री, रक्षामंत्री, वित्त मंत्री तथा उच्च शिक्षा मंत्री को भी बुलाया था। उम्मीद थी कि लविवि को इस दौरान कुछ आर्थिक मदद मिल जाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ।
लंबे समय तक चंदे से चली है संस्था
लखनऊ यूनिवर्सिटी
- फोटो : अमर उजाला
एक मई 1864 को कैनिंग कॉलेज के रूप में लविव की नींव पड़ी थी। उस समय ताल्लुकेदार ने इसकी स्थापना की थी तथा मालगुजारी से मिली रकम से इसका संचालन किया जाता था। कैंनिग कॉलेज को 25 नवंबर 1920 को अधिनियम पर हस्ताक्षर कर विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया।
इसके बाद इसे सरकारी सहायता मिलने लगी। विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने की वजह से इसके खर्च में बढ़ोतरी हो गई। अब हालत यह है कि कई बार वेतन का संकट हो जाता है और विकास के काम भी बाधित होते हैं।
लविवि संभवत: सबसे ज्यादा परीक्षा फीस लेने वाला राज्य विवि है। यहां प्रति सेमेस्टर न्यूनतम दो हजार रुपये परीक्षा फीस है, जो कि बीए के पाठ्यक्रम की फीस से भी ज्यादा है। असल में राज्य विवि होने के कारण यहां पाठ्यक्रम की फीस शासन से निर्धारित है। इसे लविवि खुद नहीं बढ़ा सकता है। ऐसे में परीक्षा फीस बढ़ाकर और स्ववत्तिपोषित पाठ्यक्रम चलाकर इसकी भरपाई करता है।
नियुक्ति के बाद आएगी वेतन देने की समस्या
लखनऊ यूनिवर्सिटी
- फोटो : amar ujala
लविवि में इस समय शिक्षकों के करीब 180 पद खाली हैं। नैक की ग्रेडिंग या फिर एनआईआरएफ की रैंकिंग के लिए लविवि को ये पद भरने होंगे। लविवि ने इनका विज्ञापन भी जारी कर दिया है। अब समस्या यह है कि बिना किसी मदद के इन नई नियुक्तियों का वेतन निकालना लविवि के लिए संभव नहीं होगा।
अनियमित नियुक्तियों के कारण फ्रीज हुई ग्रांट
लविवि को गत 20 साल से शासन से एकमुश्त राशि ही मिल रही है। शासन ने लविवि में कर्मचारियों की अनियमित और मनमानी नियुक्ति की वजह से ग्रांट फ्रीज कर दी थी। तब से इसे सिर्फ 34 करोड़ रुपये सालाना अनुदान ही मिलता है।
लविवि संभवत: सबसे ज्यादा परीक्षा फीस लेने वाला राज्य विवि है। यहां प्रति सेमेस्टर न्यूनतम दो हजार रुपये परीक्षा फीस है, जो कि बीए के पाठ्यक्रम की फीस से भी ज्यादा है। असल में राज्य विवि होने के कारण यहां पाठ्यक्रम की फीस शासन से निर्धारित है। इसे लविवि खुद नहीं बढ़ा सकता है। ऐसे में परीक्षा फीस बढ़ाकर और स्ववत्तिपोषित पाठ्यक्रम चलाकर इसकी भरपाई करता है।
अब भी है मदद की उम्मीद
हमने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है। उम्मीद है कि सरकार हमारे प्रस्ताव पर सकारात्मक निर्णय लेगी तथा आर्थिक मदद मिलेगी। - डॉ. दुर्गेश श्रीवास्तव, प्रवक्ता, लविवि