इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने थानों में सीसीटीवी फुटेज सिर्फ ढाई माह रखने संबंधी डीजीपी के आदेश को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की प्रथमदृष्टया अवमानना माना। कोर्ट ने मुख्य सचिव से जवाब मांगा है और हलफनामा न देने पर पेश होने की चेतावनी दी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पुलिस महानिदेशक (डी जी पी) द्वारा जारी उस परिपत्र पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें राज्य के सभी थानों में सी सी टी वी फुटेज केवल दो से ढाई महीने तक सुरक्षित रखने का प्रावधान किया गया है। अदालत ने इसे काफी अजीब बताते हुए कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले 'परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2020)' के प्रथमदृष्टया अवमानना जैसा प्रतीत होता है, जिसमें कम से कम छह से 18 महीने तक फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है।
यह भी पूछा है कि क्या बी एन एस एस की धारा 179(2) के तहत आवश्यक नियम बनाए गए हैं या नहीं। और, याचिकाकर्ता महिला को किस परिस्थिति में थाने बुलाया गया और क्यों? अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि हलफनामा दाखिल नहीं किया गया तो अगली सुनवाई पर मुख्य सचिव को स्वयं अदालत में उपस्थित होना होगा। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी।
न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबिता रानी की खंडपीठ ने यह आदेश उन्नाव की रूबी सिंह व अन्य लोगों द्वारा दायर याचिका पर दिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्नाव पुलिस ने उन्हें अवैध रूप से हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की।
25 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट ने मामले में उन्नाव के एसपी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने और संबंधित अवधि की सी सी टी वी फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। लेकिन, एसपी ने बताया कि फुटेज उपलब्ध नहीं है, क्योंकि 20 जून 2025 के डी जी पी के परिपत्र के अनुसार केवल 2 से 2.5 महीने की रिकॉर्डिंग ही रखी जाती है।
अदालत ने इस पर गहरी नाराज़गी जताई और कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिए हैं कि दी सी टी वी फुटेज को कम से कम छह महीने और अधिकतम 18 महीने तक सुरक्षित रखा जाए, और कहा है कि राज्यों को उसी अनुसार स्टोरेज क्षमता विकसित करनी होगी।