इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा कि दो विरोधी समूहों के बीच निजी विवाद संबंधी किसी मुद्दे को जनहित याचिका के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने इस विधि व्यवस्था के साथ प्रदेश में एंबुलेंस आपूर्ति के टेंडर विवाद को लेकर दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने यह फैसला अधिवक्ता गुरमीत सिंह सोनी की जनहित याचिका पर दिया।
याची का कहना था कि कोरोना काल में सहूलियतें बढ़ाने के लिए एंबुलेंस सेवाओं की आपूर्ति के लिए टेंडर निकाले गए। इसके लिए संबंधित प्राधिकारी ने एक पक्षकार की तकनीकी बिड मंजूर कर ली, जबकि इसी पक्षकार को मध्य प्रदेश की नेशनल हेल्थ मिशन योजना में एंबुलेंस आपूर्ति के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया था। ऐसे में टेंडर संबंधी उसकी बोली को मंजूर नहीं किया जाना चाहिए था। पर, सरकारी अफसरों ने इसकी अनदेखी करते हुए 21 मई को पक्षकार की बोली मंजूर कर ली। इस पर याची ने पक्षकार को टेंडर का लेटर ऑफ इंटेंट जारी न किए जाने की गुजारिश की थी।
उधर, याचिका का विरोध करते हुए सरकारी वकील का कहना था कि यह याचिका असफल बोली लगाने वाले की टेंडर प्रक्रिया में अड़ंगा डालने की कोशिश लगती है। जिसे पीआईएल के रूप में दायर किया गया। यह पीआईएल के उद्देश्य को दूषित करने वाली होने की वजह से खारिज करने लायक है। कोर्ट ने कई नजीरों का हवाला देते हुए फैसला दिया कि दो विरोधी समूहों के बीच निजी विवाद संबंधी किसी मुद्दे को जनहित याचिका के रूप में ग्रहण नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।