प्रीमियम किस्त का चेक बैंक में समय से जमा कराने और इसके बाउंस होने पर इसका प्रामाणिक सुबूत देना बीमा कंपनी की जिम्मेदारी है। इसमें किसी भी तरह की शिथिलता बीमा कंपनी की तरफ से सेवा में कमी है। लिहाजा बीमा कंपनी ममता देवी को क्षतिपूर्ति के लिए बीमित दावे की 21,205 रुपये सात प्रतिशत साधारण ब्याज की दर से चुकाए। इस आदेश के साथ राज्य उपभोक्ता आयोग की पीठ ने 22 साल पुराने वाद को निस्तारित कर दिया।
न्यायिक पीठ में शामिल सदस्य सुशील कुमार व विकास सक्सेना ने आदेश में कहा कि इस तथ्य को साबित करने की जिम्मेदारी बीमा कंपनी पर है कि उसकी तरफ से प्रीमियम किस्त का बैंक में प्रस्तुत किया गया चेक बाउंस हो गया। ऐसे में प्रीमियम न मिलने पर बीमा पॉलिसी का अस्तित्व खत्म नहीं माना जा सकता। इसलिए बीमा कंपनी को बीमा दावे की स्वीकृत राशि चुकानी होगी।
कचहरी रोड बलिया निवासी ममता देवी ने एक वाहन का बीमा कराया था। इसका प्रीमियम चेक से दिया गया था। प्रीमियम राशि का यह चेक बैंक से बाउंस हो गया। इस बीच वाहन के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर ममता देवी ने बीमा क्लेम का दावा पेश किया। कंपनी ने बीमा पॉलिसी के दावे का भुगतान करने से इनकार कर दिया।
ममता देवी ने बीमा क्लेम पाने के लिए जिला उपभोक्ता आयोग बलिया में वाद दाखिल किया। सुनवाई के बाद वर्ष 2001 में जिला आयोग ने बीमा कंपनी को बीमित धनराशि के बतौर 41,669 रुपये का दावा चुकाने का आदेश दिया। इसके खिलाफ ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी लि. के ब्रांच मैनेजर ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दाखिल की।
न्यायिक पीठ ने पाया कि प्रीमियम की अदायगी के लिए ममता देवी की तरफ से चेक देने की बात स्वयं बीमा कंपनी स्वीकारी है लेकिन वह चेक के बाउंस होने का सुबूत नहीं पेश कर सकी। इसलिए जिला आयोग के निर्णय में कुछ बदलाव करते हुए बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह सर्वेयर की तरफ से स्वीकृत बीमा दावे की राशि सात प्रतिशत साधारण ब्याज की दर के साथ चुकाए।