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अब शुरुआत में ही फाइब्रोसिस का चल जाएगा पता, नहीं होगा लिवर खराब

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लखनऊ। सीबीएमआर (सेंटर ऑफ बॉयो मेडिकल रिसर्च) लखनऊ मेें लिवर फाइब्रोसिस से जुड़ा एक ऐसा शोध सामने आया है, जिससे फाइब्रोसिस का शुरूआत में ही पता चल जाएगा। इससे न सिर्फ इलाज करने में आसानी होगी, बल्कि भविष्य में लिवर खराब होने के खतरे को भी कम किया जा सकता है।
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इस कार्य में एसोसिएट प्रोफेसर बिश्वनाथ मैती के साथ उनकी टीम के तरुण महाता, माधुरी बसक, अभिषेक एस. सेंगर, किरन दास, मनीष कुमार ने काफी मेहनत की। जुलाई महीने में ही यह एंटीआक्सीडेंट्स एंड रेडाक्स सिग्नलिंग जर्नल में प्रकाशित हुआ है। टीम काफी समय से इस दिशा में कार्य कर रही थी कि कोई ऐसा तरीका खोजा जाए, जिससे लिवर फाइब्रोसिस का शुरूआती अवस्था में ही पता लगाया जा सके। किसी व्यक्ति के फाइब्रोसिस से ग्रसित होने पर आसानी से इसके लक्षण सामने नहीं आते। फाइब्रोसिस होने पर लिवर सामान्य की तुलना में काफी कठोर हो जाता है। वहीं फैटी लिवर इसकी अगली अवस्था होती है। इसमें लिवर के स्वस्थ टीशू पर घाव बन जाने के कारण लिवर ढंग से काम नहीं कर पाता और लिवर की स्वस्थ कोशिकाएं खराब होती जाती हैं। इससे भी ज्यादा गंभीर स्थिति होने पर लिवर सिरोसिस का खतरा होता है। सिरोसिस में लिवर प्रत्यारोपण के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचता। लिवर फाइब्रोसिस का एक कारण एनएएफएलडी (नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज) भी है। क्रोनिक हेपेटाइटिस सी संक्रमण वाले व्यक्तियों को भी लिवर फाइब्रोसिस की समस्या अधिक रहती है। फाइब्रोसिस का पता करने के लिए फाइब्रोस्कैन व बॉयोप्सी का सहारा लिया जाता है।
एसोसिएट प्रोफेसर बिश्वनाथ मैती कहते हैं, फाइब्रोसिस को कुछ हद तक दवाओं से भी ठीक किया जा सकता है, पर इसके मॉडरेट स्टेज से ऊपर निकल जाने पर लिवर को इसकी सामान्य अवस्था में लाना काफी मुश्किल होता है। जी प्रोटीन रेगुलेटर आरजीएस7 प्रोटीन को टारगेट करके लिवर फाइब्रोसिस का शुरू में पता लगाकर लिवर कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों को रोका जा सकता है।
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निदेशक प्रो. आलोक धवन कहते हैँ, सीबीएमआर क्लीनिकल रिसर्च के क्षेत्र में कार्यरत है। इसका फायदा मरीजों के इलाज में होता है। डॉ. बिश्वनाथ मैती द्वारा इस प्रोटीन के खोजने से लिवर से संबंधित गंभीर बीमारियों का शुरूआत में ही पता लगने से इलाज में मदद मिलेगी।
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