बिना आईसीयू यूनिट और वैंटीलेटर के ही एक प्रसूता को भर्ती कर डॉक्टर ने आपरेशन कर डाला। हालत बिगड़ने पर आनन फानन में प्रसूता को एक दूसरे नर्सिंग होम भेज दिया। इसके बाद एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल की दौड़ लगाने के दौरान ही प्रसूता की मौत हो गई। दस साल पहले चिकित्सकीय लापरवाही से हुई प्रसूता की मौत के इस मामले में राज्य उपभोक्ता आयोग की पूर्ण पीठ ने अस्पताल व डॉक्टर पर 25 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है।
राजेंद्र सिंह की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अपने आदेश में टिप्पणी की कि डॉक्टर और मरीज का आपसी संबंध अत्यन्त महत्व का होता है। डॉक्टर का यह दायित्व होता है कि वह मरीज को इलाज से पहले सारे तथ्यों से अवगत कराए। ऐसा न करना डॉक्टर की तरफ से सेवा में लापरवाही बरतना है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अस्पताल व डॉक्टर 45 दिनों में मृतका के परिजन को 12 जनवरी 2013 से 12 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ 25 लाख की राशि चुकाएंगे।
शकुन मैटरिनिटी होम में कराया था भर्ती
वादी अजेश कुमार ने गर्भवती पत्नी आरती को 27 अगस्त 2012 को शकुन मैटरिनिटी होम, मंदिर मार्ग महानगर, लखनऊ में डॉ. नीलिमा सिंह को दिखाया था। दिसंबर 2012 में पेट में दर्द होने पर उसे नर्सिंग होम ले जाया गया। उस समय वह 32 माह के गर्भ से थी। 7 जनवरी 13 को आरती का सीजेरियन डॉ. नीलिमा ने किया। प्रसव के बाद उसकी हालत बिगड़ने लगी। ऐसे में अस्पताल में आईसीयू व वैंटीलेटर सर्पोट की सुविधा न होने के कारण उसे समीप के नीरा नर्सिंग होम शिफ्ट किया गया। 10 जनवरी 2013 को नीरा में भी हालत न सुधरने के बाद आरती को केजीएमयू अथवा एसजीपीजीआई ले जाने का सुझाव दिया। दोनों ही जगह वैंटीलेटर खाली न मिलने के कारण परिजन आरती को लेकर राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे। जहां उसकी मौत हो गई। इस मामले में मृतका के पति अजेश कुमार ने शकुन मैटरनिटी होम तथा डॉ. नीलिमा सिंह पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए राज्य उपभोक्ता आयोग में वाद दाखिल किया।
संसाधन न होने पर भी प्रसूता को किया भर्ती
प्रिसाइडिंग जज राजेंद्र सिंह की अध्यक्षता में सदस्य सुशील कुमार और विकास सक्सेना की पूर्णपीठ ने पाया कि प्रसूता की सर्जरी के दौरान शकुन मैटरनिटी होम के पास न तो कोई आईसीयू यूनिट थी और न ही वैंटीलेटर सर्पोट की सुविधा। इसके बावजूद डॉ. नीलिमा की निगरानी में प्रसूता को अस्पताल में भर्ती कर उसका आपरेशन किया गया।
पति से ली थी लिखित अंडरटेकिंग
इलाज के दौरान शकुन मैटरनिटी होम ने प्रसूता के पति से इस आशय की लिखित अंडरटेकिंग ली थी कि वह मरीज को मेडिकल कालेज नहीं ले जाएगा तथा कोई हादसा होने पर बच्चे की जिम्मेदारी लेने को भी तैयार है। पीठ ने माना कि कोई भी डॉक्टर अथवा नर्सिंग होम किसी को भी इलाज के लिए किसी विशेष अस्पताल में जाने अथवा रोकने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है।