‘म्यूनिसिपल बॉण्ड’ जारी कर लखनऊ नगर निगम ने प्रदेश के अन्य नगर निकायों के विकास का रास्ता खोल दिया है। लखनऊ नगर निगम द्वारा जारी बांड को लेकर निवेशकों का जिस तरह का रिस्पांस सामने आया है, उससे कई अन्य नगर निगम भी उत्साहित हैं। इसके मद्देनजर सरकार भी कई और नगर निगमों के लिए बांड जारी कर वित्तीय संसाधन जुटाने को लेकर गंभीरता से विचार कर रही है। हालांकि लखनऊ के बाद सबसे पहले गाजियाबाद का म्यूनिसिपल बांड जारी करने की तैयारी है, लेकिन एक-एक करके स्मार्ट सिटी के रूप में चयनित सभी नगर निगमों के लिए म्यूनिसिपल बांड जारी करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
दरअसल उत्तर भारत में पहले नगर निगम के रूप में लखनऊ निगम द्वारा जारी म्यूनिसिपल बांड को जिस तरह से 225 गुना अधिक सब्सक्रिप्शन मिला है, उसे यूपी में बदले माहौल का परिणाम माना जा रहा है। आबादी के लिहाज देश का सबसे बड़ा प्रदेश व तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते भी निवेशकों का अवस्थापना विकास के क्षेत्र में काफी संभावनाएं नजर आ रही है। इसलिए उन्हें नगर निकायों के जरिए इस क्षेत्र में निवेश का एक बड़ा अवसर भी दिखाई दे रहा है।
उधर आर्थिक रूप से काफी कमजोर हो चुके नगर निगमों को भी वित्तीय रूप से आत्म निर्भर बनाना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रदेश में जिस तेजी से शहरीकरण बढ़ रहा है, उसी गति से नगर निगमों की वित्तीय क्षमता कमजोर होती जा रही है। ऐसे में सरकार के लिए नगर निकायों में प्रशासनिक व वित्तीय सुधार के लिए म्यूनिसिपल बांड एक बेहतर साधन साबित हो सकता है। इसलिए सरकार का पूरा फोकस अब ऐसे सभी नगर निकायों के लिए म्यूनिसिपल बांड जारी करने पर है।
लखनऊ नगर निगम का म्यूनिसिपल बांड को लेकर निवेशकों की रूचि को देखते हुए अब सरकार के स्तर पर प्रदेश के सभी बड़े शहरों वाले नगर निकायों का म्यूनिसिपल बांड जारी करने पर गंभीरता से मंथन शुरू हो गया है। फिलहाल तो गाजियाबाद नगर निगम का बांड जारी करने की प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली गई है। अगले तीन महीने के भीतर इसे भी बाम्बे स्टाक एक्सचेंज (बीएसई) में सूचीबद्ध कराने की तैयारी है। इसके बाद एक-एक करके स्मार्ट सिटी के रूप में चयनित अन्य शहरों से संबंधित नगर निकायों का भी म्यूनिसिपल बांड जारी किया जाएगा। ताकि सभी नगर निकायों में अवस्थापना विकास को गति देने के साथ ही निकायों की वित्तीय क्षमता को भी बढ़ाया जा सके।
इसलिए भी है बांड जारी करने की जरूरत
चतुर्थ वित्त आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के नगर निकायों द्वारा शहरों में रहने वाले लोगों को मानक के मुताबिक नगरीय सुविधाएं न मुहैया कराने की मुख्य वजह अवस्थापना का अभाव है। वित्तीय संसाधनों की भारी कमी है। निकायों के निजी श्रोतों से आय से अधिक धनराशि उनके अधिष्ठान पर खर्च होता है। इसलिए अधिष्ठान का खर्च जुटाने के लिए नगर निकायों को वित्त आयोगों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका परिणाम यह होता है कि अवस्थपना सुविधाओं के सृजन, विकास और अनुरक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में म्यूनिसिपल बांड के जरिए नगर निकायों की वित्तीय क्षमता को बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
25 प्रतिशत राजस्व ही जुटाते हैं प्रदेश के नगर निकाय
प्रदेश में नगर निकायों की वित्तीय क्षमता काफी कम होने की मुख्य वजह व्यय की तुलना में मात्र 25 प्रतिशत ही राजस्व का प्राप्त होना है। चतुर्थ वित्त आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक नगर निकायों को प्रति व्यक्ति 207 रुपये प्रति वर्ष की दर से औसत राजस्व प्राप्ति होती है। वहीं नगर निकायों द्वारा प्रति वर्ष किए जाने वाले व्यय में से मात्र 25 प्रतिशत ही औसत राजस्व एकत्र किया जाता है। अलग-अलग देखें तो नगर निगमों द्वारा प्रति वर्ष 30 प्रतिशत, नगर पालिका परिषद द्वारा 11 और नगर पंचायतों द्वारा मात्र 6 प्रतिशत ही राजस्व जुटाया जाता है।
एक-एक करके जारी होगा सभी नगर निगमों का म्यूनिसिपल बांड
‘प्रदेश के सभी नगर निकायों की वित्तीय क्षमता विकसित करने के लिए म्यूनिसिपल बांड एक कारगर जरिया है। इसलिए सभी नगर निकायों का बांड जारी किया जाएगा। बहुत जल्द ही गाजियाबाद नगर निगम का बांड जारी कर दिया जाएगा। इसके अगली कड़ी में एक-एक करके वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, आगरा, बरेली, अलीगढ़, झांसी, सहारनपुर व मुरादाबाद नगर निगम का बांड जारी करने की योजना है।’ आशुतोष टंडन, नगर विकास मंत्री।