‘बात 1920-21 के लखनऊ की है। कॉरपोरेटर का चुनाव होना था। एक नामी हकीम शम्सुद्दीन नक्खास में रहते थे। उन्हें चुनाव में खड़ा कर दिया गया। जब मालूम हुआ कि दूसरे पक्ष ने एक तवायफ दिलरुबा जान को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया है तो हकीम शम्सुद्दीन ने समर्थकों से कहा कि कैसी फजीहत में तुम लोगों ने डाल दिया है।
इस बीच प्रचार शुरू हुआ तो दिलरुबा जान के साथ बेनजीर, अल्लारक्खी, हुसने बांदी तवायफें भी आ गईं। हकीन को हार दिख रही थी। तब पोस्टर, लाउड स्पीकर तो होते नहीं थे, समर्थकों ने लखनऊ की दीवारों पर नारा लिखवाया ‘दिल दीजिए दिलरुबा को और वोट हकीम शम्सुद्दीन को’।
नारा लोकप्रिय हुआ। हकीम साहब चुनाव जीत गए। हार के बाद दिलरुबा ने जवाब दिया ‘इतना तो मालूम हो गया, कि लखनऊ में मरीज बहुत ज्यादा हैं, और मर्द बहुत कम।’
लखनऊ की तवायफों की हाजिर जवाबी और तहजीब को लेकर डॉ. योगेश प्रवीन ने यह दुर्लभ किस्सा शनिवार को राजधानी के एमबी क्लब में सुनाया। मौका था राम किशोर बाजपेयी की लिखी पुस्तक ‘लखनऊ की तवायफ’ के विमोचन का।
तहजीब सिखाने बेटों को भेजते थे तवायफों के पास
राम किशोर वाजपेयी ने बताया कि डेढ़ सदी पहले तक कानपुर के सुनार देश भर में जाने जाते थे और हैदराबाद-दक्खिन की बेगमें उनसे जेवर खरीदती थीं।
यह सुनारों के लिए बड़ा मौका होता था, और इस दौरान इन बेगमों की शान में कोई गुस्ताखी न हो जाए, इसलिए ये परिवार अपने बेटों को किशोर उम्र से ही तहजीब सिखाने लखनऊ की तवायफों के पास भेजा करते थे।
डॉ. प्रवीन ने बताया कि बडे़-बड़े शायर, तवायफों के सामने शेर कहते थे क्योंकि रजवाड़े उस समय तक खत्म हो चुके थे और ललित कलाओं को संरक्षण की जरूरत थी। यह संरक्षण कोठों पर मिला।
जब रेडियो स्टेशन खुले तो तो वहां भी जितनी रिकॉर्डिंग हुई वो गौहर जान, छप्पन छुरी, रसूलन, मुन्नी बेगम, अख्तरी बाई फैजाबादी, रसूलन बाई, धेला बाई, चवन्नी बाई, सिद्धेश्वरी, विद्याबाई ने की।
तवायफों को मिलता था सम्मान
‘हमारा लखनऊ पुस्तक माला’ के तहत तैयार की गई इस 37वीं पुस्तक में तवायफों और लखनऊ के इतिहास, तथ्यों और रोचक किस्सों को सामने रखा गया है।
विमोचन कार्यक्रम लखनऊ एक्सप्रेशंस सोसाइटी के तहत आयोजित किया गया, जिसमें सोसाइटी के संस्थापक कनक रेखा चौहान और जयंत कृष्णा सहित बड़ी संख्या में लखनऊ के गणमान्य नागरिक मौजूद थे।
इस मौके पर पुस्तक और लखनऊ की तवायफों की तहजीब को लेकर कई रोचक बातें राम किशोर वाजपेयी और डॉ. प्रवीन ने लोगों के सामने बयां की।
इस मौके पर डॉ. प्रवीन ने कहा कि तवायफों के लिए आज चाहे जैसे शब्द उपयोग होते हों, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं था। खुद उनकी मां तवायफों को सम्मान से घर बुलाती थीं।