जांच रिपोर्ट में संस्थान के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और फैकल्टी सदस्यों की संदिग्ध भूमिका पर भी बड़े सवाल उठाए गए हैं। पैथोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुभाष कुमार पर पीड़ितों की शिकायतों पर कोई कार्रवाई न करने और आरोपियों का पक्ष लेने के आरोप हैं। साथ ही पैथोलॉजी विभाग की बायोकेमिस्ट्री लैब के प्रभारी डॉ. वाहिद अली पर कुछ आरोपी डॉक्टरों का समर्थन करने और नए मुस्लिम छात्र-छात्राओं को संगठित करने का आरोप लगाया गया है।
एसटीएफ की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि आगरा के सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज में पहले 'इस्लामिक स्टूडेंट ग्रुप' और बाद में 'इस्लामिक मेडिकल ग्रुप' बनाया गया था, जिसमें केजीएमयू के कुछ डॉक्टर भी शामिल थे। इसके अलावा मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर उस्मान कौसर, बायोकेमिस्ट्री विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अहमद और डॉ. कलीम की भूमिका का भी उल्लेख है। रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि पीड़िताओं को विरोध या शिकायत करने पर उनके करियर को बर्बाद करने और परीक्षा में फेल कराने की धमकियां दी जाती थीं।
शासन की ओर से कार्रवाई के कड़े निर्देश
एसटीएफ ने गत 25 अगस्त को अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट शासन को सौंपी थी, जिसके बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने 30 अक्तूबर को केजीएमयू के कुलसचिव को पत्र भेजकर केजीएमयू अधिनियम-2002 और परिनियमावली-2011 के प्रावधानों के तहत कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है। शासन ने विश्वविद्यालय प्रशासन से इस मामले में की गई कार्रवाई की पूरी रिपोर्ट भी तलब की है।