मोहनलालगंज कांड में फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर वह कौन है, जिसे पुलिस शुरू से बचाने की कोशिश कर रही है।
तफ्तीश की कमान पुलिस के अनुभवी अफसर संभाले हुए थे, फिर भी वारदात का खुलासा जिस गैर पेशेवराना अंदाज में किया गया, उससे शक की सुई और गहरा रही है।
पुलिस इस वारदात में रामसेवक यादव के अकेले ही होने का दावा करती रही। माना जा रहा है कि इसी दावे की वजह से एडीजी सुतापा सान्याल पीछे हट गई थीं।
पुलिस के रिटायर्ड अफसर यह मानने को कतई तैयार नहीं कि इतने स्तरों पर पुलिस से चूक हो सकती है।
युवती के अंतिम संस्कार के बाद यू-टर्न
वारदात में एक से अधिक लोगों के शामिल होने की बात सबसे पहले एडीजी सुतापा सान्याल ने कही थी, लेकिन महिला का अंतिम संस्कार होने ही पुलिस ने यू-टर्न ले लिया।
कई कड़ियों को जोड़े बगैर और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किए बिना वह इस नतीजे पर पहुंच गई कि महिला के साथ गैंगरेप या रेप नहीं हुआ है। खुलासे में इतनी हड़बड़ी थी कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को भी दरकिनार कर दिया गया।
मौका-ए-वारदात पर जिस तरीके से महिला के कपड़ों के चीथड़े मिले, घसीटने के निशान मिले, निजी अंगों पर चोटें मिलीं, उससे साफ था कि वारदात में एक से अधिक लोग शामिल हैं।
खुद को बचाने के लिए महिला के संघर्ष के निशान भी साबित करते थे कि वारदात में कई लोग शामिल थे। पुलिस ने इन तमाम सवालों के जवाब किन वजहों से तलाशने की कोशिश नहीं की, इस पर पुलिस के रिटायर्ड अफसर भी सवाल उठा रहे हैं।
रिटायर्ड अफसर बोले, आखिर इतनी हड़बड़ी क्यों?
मामले पर पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि ‘हड़बड़ी में पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार कराने के पीछे कोई रसूखदार या सत्ता से जुड़ा व्यक्ति तो नहीं? आखिर ऐसा कौन है जिसे बचाने के लिए पुलिस ने सभी साक्ष्यों को नजरअंदाज करते हुए नई कहानी गढ़ दी। यह सच सामने आना चाहिए।’
वहीं पूर्व डीजी बाबूलाल यादव का कहना है कि ‘जिस तरह महिला से रेप हुआ, उसे चोटें पहुंचाई गईं, खींचा गया, यह सब अकेले व्यक्ति का काम नहीं हो सकता है। परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी पुलिस की थ्योरी के खिलाफ हैं। जरूर पुलिस किसी को बचाने का प्रयास कर रही होगी, तभी कहानी गढ़ी गई है।’