बात केवल बन्ना-बन्नी की, सजना-सजनी की। कभी प्यार की तो कभी तकरार की। कभी विरह वेदना की और कभी चुहलबाजी की। यह सब कुछ मिलता है गऊनई में। गऊनई एक ऐसी विधा है।
जिसमें खुशियों के अवसर पर लोकगीत गाए जाते हैं। एक समय था, जब शादी, मुंडन, जनेऊ, सालगिरह कोई भी मौका हो, जब तक घर से गऊनई की आवाजें नहीं आने लगती थीं।
तब तक महिलाएं शिरकत करने के लिए नहीं पहुंचती थी। बन्ना बन्नी, भंवरे, गाली और विदाई सब कुछ लोकगीतों के माध्यम से ही मुखर हुआ करता था।
महोत्सव की ग्यारहवीं सांस्कृतिक प्रस्तुति के तहत सोमवार की रात मंच गऊनई का आंगन बन गया।
उस पर मालिनी अवस्थी की शादी की 25वीं वर्षगांठ ने कार्यक्रम का मजा कई गुना बढ़ा दिया मालिनी के लोकगीतों में मिट्टी की सौंधी महक को बखूबी महसूस किया गया।
आखिर में अपने मशहूर फिल्मी गीत ‘यूं तो प्रेमी पिचहत्तर हमारे...’ गाया। यहां आनंद लेने वालों में सबसे आगे तो खुद कैबिनेट मंत्री अंबिका चौधरी रहे।
मालिनी ने कार्यक्रम का आगाज देवी गीत ‘नीमिया के डाल मइया झूली झूलेला, मइया मोरी गावेली....’ से किया। इसके बाद शुरू हुआ विवाह गीतों का सिलसिला।
दूल्हे की एक झलक को बेकरार सखियां कहती हैं ‘मैं किस विध देखन आऊं, रंगीले आए गए बागों में...’। फिर जब द्वारे पर बारात आ गई तो मालिनी के मुंह से बरबस बोल फूटे ‘द्वारे पर आई बारात रंगीला बन्ना ब्याहने आया...’।
भंवरों का समय आ गया और जब लड़की के भाई ने गमछे से लावा छोड़ना शुरू किया तो स्वर फूटे ‘घूमत घूमत लावा डालो रे भइया....’।
शादियों में आमतौर से रूठने वाले लड़के फूफा और घर के दामादों को समर्पित थी एक और गऊनई ‘प्यारे नंदोइया गलती भई, सरौता कहां भूल आई....’।
इसके बाद अवध और पूर्वांचल के विवाह समारोहों में लोक गालियां भी बड़ा हिस्सा रही है। उन्होंने ‘कोई हंसना मत बारात आती है...’ घर-घर बजत बधउआ कि आए बरतिया रे...’ सुनाया।
इसके बाद जब कच्चा खाना खाने की बारी आई तो किस तरह से लड़की पक्ष की महिलाएं लड़के के पिता को गारी सुनाती हैं, उसकी नजीर मालिनी ने पेश की और गाया ‘मढ़ुए के नीचे जीमै समधी जैसे जीमै कोई हउआ...’।
विदाई की बेला आ गई तो मानो आंखों में बरबस आंसू आ गए हों ‘पंडाल में फिर गीत गूंजा ‘काहे को ब्याही विदेस, अरे लखिया बाबुल मोहे....’ फिर ‘बात सजना के आंगन की बन्ना बुलाए, बन्नी नहीं आए, चली आओ बन्नी रे अटरिया सूनी पड़ी...’ गीत सुनाया।
इसके बाद बन्ना के काम के लिए परदेस जाना और बन्नी का बिरहन हो जाने पर ‘रेलिया बैरन पिया को लिये जाए रे...’ सुनाया।
परदेस से आकर सईया मिले भी तो क्या फायदा जब, सइया मिले लरकइया मैं का करूं....’ मालिनी ने कुछ यूं सइया की नादानियों को बखूबी इंगित किया।
इन गीतों के बाद एजेंट विनोद फिल्म के अपने मशहूर आइटम सांग ’यूं तो प्रेमी पिचहत्तर हमारे, ले जा तू कर सत्तर इशारे, दिल मेरा मुफ्त का...’ गाया और लोगों को थिरकने पर मजबूर कर दिया।
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