लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में चल रहे फाजिल और अलीम कोर्स असांविधानिक नहीं होंगे। ये पूर्व की तरह ही मान्य रहेंगे। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का इन कोर्सों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके पीछे कारण है कि ये कोर्स यहां 1864 से लगातार चल रहे हैं और ये डिग्री कोर्स न होकर केवल डिप्लोमा हैं।
लखनऊ विवि में ओरिएंटल अरबी और पर्शियन विभाग के अंतर्गत छह कोर्सों का संचालन होता है। इनमें दबीर-ए-माहिर, दबीर-ए-कामिल, अलीम, फाजिल-ए-अदब, फाजिल-ए-तफसीर शिया और फाजिल-ए-तफसीर सुन्नी शामिल हैं। ये सभी डिप्लाेमा कोर्स हैं। सोमवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इन कोर्सों को लेकर भी विद्यार्थियों में शंकाएं थीं। विभाग के शिक्षकों से बातचीत करने पर स्थिति साफ हुई।
लविवि शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष और विभाग में शिक्षक डॉ. सैयद अरशद जाफरी के मुताबिक, प्राच्य अरबी और पर्शियन विभाग के सभी पाठ्यक्रम डिप्लोमा स्तर के कोर्स हैं। इस नाते यह सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से मुक्त हैं। इनकी डिग्री असांविधानिक नहीं होगी। कोर्ट ने यूजी और पीजी की डिग्री को ही अवैध बताया है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय पीठ ने सोमवार को फैसला देते हुए उत्तर प्रदेश मदरसा एजुकेशनल बोर्ड के कामिल व फाजिल कोर्स की डिग्री को असांविधानिक करार दिया है। मदरसा एक्ट में आलिम को स्नातक और फाजिल को परास्नातक डिग्री की मान्यता दी गई है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे गलत बताते हुए यूजीसी एक्ट के विरुद्ध बताया है।
1864 से चल रहे कोर्स, कभी नहीं होंगे बंद
डॉ. सैयद अरशद जाफरी ने बताया कि लविवि में ओरिएंटल अरबी और पर्शियन विभाग 1864 से स्थापित है। इसमें पढ़ाई भी तब से ही जारी है। विभाग के अधीन चलने वाले सभी कोर्स परंपरागत हैं। कैनिंग कॉलेज की स्थापना के समय नवाबीन-ए-अवध ने इसी शर्त पर जमीन देने की स्वीकृति दी थी कि ये कोर्स कभी बंद नहीं किए जाएंगे। लविवि के एक्ट में भी इसका प्रावधान है। नवाबीन-ए-अवध में राजा महमूदाबाद भी शामिल थे।