उत्तर प्रदेश में लोकसभा के चुनावी रण में पिछड़ी जाति के दिग्गज नेताओं का असल इम्तिहान पूर्वांचल के मैदान में होगा। सपा और भाजपा से जुड़े पिछड़े वर्ग के कई ऐसे नेता हैं, जो अपनी-अपनी जाति का वास्तविक नेता होने का दम भरते हैं। कई खुद मैदान में हैं, तो कई अपने बेटे या परिजन को बतौर प्रत्याशी मैदान में उतार चुके हैं। कुछ नेता ऐसे भी हैं, जो 2019 के चुनाव में भाजपा के साथ थे, पर अब अपने दम पर मैदान में हैं। इसलिए माना जा रहा है कि पूर्वांचल में इस बार अनुप्रिया पटेल, डॉ. संजय निषाद, ओमप्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य व दारा सिंह चौहान जैसे पिछड़े वर्ग के चेहरों की असली परीक्षा होगी। एक रिपोर्ट...
ओमप्रकाश राजभर : बेटे को जिताने के साथ भाजपा को बढ़त दिलाने की चुनौती
सबसे पहले बात सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर की। इस पार्टी का गठन तो 2002 में ही हो गया था, मगर खाता खुला भाजपा गठबंधन में आकर 2017 के विधानसभा चुनाव में। तब भाजपा ने सुभासपा को 8 सीटें दी थीं। इनमें से वह सिर्फ चार ही जीत पाई थी। लोकसभा चुनाव में भी सुभासपा भाजपा के साथ मिलकर चुनाव मैदान में है।
राजभर खुद तो चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन घोसी सीट से अपने बेटे अरविंद राजभर पर दांव लगाया है। ओमप्रकाश की पूरी सियासत राजभर के अलावा बिंद, कुम्हार, प्रजापति, कुशवाहा, कोइरी जैसी पिछड़ी जातियों पर केंद्रित है। इन्हीं जातियों से जुड़े मुद्दों को उठाकर वह सत्ता में भागीदार भी बने हैं। ऐसे में बेटे को जिताने के साथ ही इन जातियों की बहुलता वाली सीटों पर भाजपा को बढ़त दिलाने की भी उनके सामने चुनौती होगी।
संजय निषाद : तय होगा कद
खुद को निषादों के नेता के रूप में प्रचारित करने वाले एनडीए के सहयोगी और प्रदेश सरकार में मंत्री डॉ. संजय निषाद का दावा है कि पूर्वांचल की 24 से अधिक सीटों पर उनकी बिरादरी का अच्छा खासा प्रभाव है। कोई भी दल उनके सहयोग के बिना चुनाव नहीं जीत सकता। ये अलग बात है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में अपने दम पर 72 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली निषाद पार्टी को मात्र 3.58 फीसदी वोट ही मिले थे।
बात लोकसभा चुनाव की करें, तो भाजपा ने 2019 में संजय के बेटे प्रवीण निषाद को अपने सिंबल पर संतकबीरनगर के मैदान में उतारा था। इस बार के चुनाव में भी प्रवीण भाजपा के ही सिंबल पर ही मैदान में उतरे हैं, लेकिन उनकी बिरादरी के वोट बैंक का कितना फायदा भाजपा को मिलेगा, यह देखने वाली बात होगी। माना जा रहा है कि यह चुनाव निषाद के प्रभाव का पैमाना भी बनेगा।
अनुप्रिया : कुर्मी बहुल सीटों पर इम्तिहान
अब बात एनडीए के सबसे पुरानी सहयोगी अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल की। पूर्वांचल में कुर्मी बिरादरी की काफी संख्या है। भाजपा के साथ अनुप्रिया का यह तीसरा लोकसभा चुनाव है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भी अनुप्रिया की पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा था। लोकसभा के पूर्व के दो चुनावों में अनुप्रिया के कोटे में दो सीटें ही दी गई थीं और इस बार भी दो ही सीटें मिली हैं। इनमें से मिर्जापुर सीट से खुद अनुप्रिया चुनाव लड़ती हैं। ऐसे में दोनों सीटें जीतने के साथ ही अनुप्रिया पर भाजपा उम्मीदवारों को भी उन सीटों पर चुनाव जिताने की चुनौती होगी, जिन पर कुर्मी मतदाता निर्णायक हैं।
दारा सिंह : कसौटी पर बिरादरी में पैठ
पूर्वांचल में खुद को चौहान बिरादरी का बड़ा चेहरा बताकर कभी भाजपा, तो कभी सपा में कुर्सी पाने वाले मंत्री दारा सिंह चौहान एक बार फिर से भाजपा के पाले में हैं। उनकी बिरादरी का ख्याल कर ही भाजपा ने उन्हें न केवल दोबारा पार्टी में लिया, बल्कि घोसी में उप चुनाव हारने के बाद भी कैबिनेट मंत्री बनाया। इस लिहाज से इस बार के चुनाव में दारा पर बिरादरी के वोटबैंक को भाजपा के पक्ष में लामबंद करने की चुनौती होगी।
विपक्ष में इन चेहरों का इम्तिहान
स्वामी प्रसाद : एकला चलो कितना होगा कारगर
2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की छतरी में रहने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य भी खुद को बतौर बड़े ओबीसी नेता के तौर पर पेश करते रहे हैं। इसी के आधार पर स्वामी 2019 के चुनाव में बिटिया संघमित्रा मौर्य को बदायूं से जिताने में कामयाब हुए थे। पर, इस बार वह भाजपा के खिलाफ हैं। भाजपा ने इस बार संघमित्रा का टिकट काट दिया है, पर वह अब भी भगवा खेमे में ही हैं। वहीं, सपा से रिश्ता टूटने के बाद स्वामी अकेले चुनाव में हुंकार भर रहे हैं। ऐसे में देखना यह होगा कि वे इस बार भाजपा समेत सभी प्रतिद्वंद्वियों को कितना नुकसान पहुंचा पाते हैं।
कृष्णा व पल्लवी के सामने भी चुनौती
सपा के पीडीए के खिलाफ एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिलकर पिछड़ा, दलित, मुस्लिम (पीडीएम) न्याय मोर्चा का गठन करने वालीं अपना दल (कमेरावादी) की अध्यक्ष कृष्णा पटेल और पल्लवी पटेल भी इस चुनाव में अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटी हैं। हालांकि, इसके पहले भी मां-बेटी कई चुनावों में मैदान में उतरी थीं, पर पल्लवी को पहली बार सफलता 2022 के विधानसभा चुनाव में मिली। वह भी सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ीं तब जीतीं। पर, लोकसभा चुनाव में पीडीएम के जरिये वह अब तक 20 सीटों पर उम्मीदवार उतार चुकी हैं। इसलिए उनके इस सियासी प्रयोग की भी चुनाव में परीक्षा होगी।