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सुल्तानपुर: बेटे की सीट पर मां को कितना मिलेगा दुलार, मेनका के सामने संजय और चंद्रभद्र की चुनौती

Thu, 09 May 2019 02:47 PM IST
देव कश्यप शरद गुप्ता, अमर उजाला, सुल्तानपुर
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मेनका गांधी (भाजपा), संजय सिंह (कांग्रेस), चंद्रभद्र सिंह (गठबंधन) - फोटो : अमर उजाला
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वह गहरे चटक रंगों वाली सूती साड़ी पहनती हैं। कंधों तक कटे, खुले, अधपके बाल। बिना किसी मेकअप के। भाजपा उम्मीदवार मेनका गांधी इस चुनाव में खुद को मां कहलाना पसंद कर रही हैं। आखिर यहां के निवर्तमान सांसद वरुण गांधी उनके बेटे जो हैं। पिछली बार वह पीलीभीत से जीतकर संसद पहुंची थीं। इस बार मां-बेटे के बीच सीट की अदला-बदली हो गई। 

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हर नुक्कड़ सभा में वे कहती हैं- मैं सात बार पीलीभीत से जीतती आई हूं। 25 साल से संसद में हूं। आप जिताएंगे तो सबसे ज्यादा बार जीतने वाली सांसद बन जाऊंगी।  पीलीभीत का बच्चा-बच्चा जानता है, मैं उसकी मां हूं। उनकी हर चीज का ख्याल करती हूं। न कौम देखती हूं, न जात। बस देखती हूं कि अपने बच्चों का दुख-दर्द कैसे दूर करूं।

वे लोगों से कहती हैं- जाइए, पीलीभीत में मेरा काम देखिए। मैं हर सप्ताह अपने चुनाव क्षेत्र जाती थी और कम से कम 30 गांव घूमती थी। प्रधानमंत्रीजी ने गांव के विकास के लिए बहुत कुछ किया है। रसोई गैस दी है, शौचालय दिए, मुफ्त बिजली कनेक्शन दिए हैं, सड़कें दीं, पानी पहुंचाया, पक्के मकान दिए हैं। आप हमें भी ताकतवर बनाइए, प्रधानमंत्रीजी को भी। सभाओं में महिलाओं को देखकर उनकी आंखों में चमक आ जाती है। तुरंत नाता जोड़ती हैं। कहती हैं कि महिलाएं ही धरती की शक्ति हैं। आप भी खुद को किसी से कम मत समझना। यदि आप मुझे जिताते हैं तो आपको एक कर्मठ, ईमानदार और मेहनती सांसद मिलेगा। 

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बाहुबली प्रत्याशी और पूर्व राजा से त्रिकोणीय मुकाबला

उनके हर तीसरे-चौथे वाक्य पर खूब तालियां बजती हैं। खासतौर पर महिलाएं जोर से बजाती हैं। कुछ बुर्का पहने महिलाएं भी हैं। तलवार खान बताते हैं, मेनका पहली बार आई हैं, इसलिए हर मजहब, हर जाति के लोग उन्हें देखने आए थे। जरूरी नहीं कि सभी उन्हें वोट भी दें। यह सदर विधानसभा का गुड़बुड़ गांव है। सुबह ग्यारह बजे हैं और यह उनकी सातवीं जनसभा है। शाम छह बजे तक उन्हें बीस गांवों में सभाएं संबोधित करनी है। पीलीभीत का चुनाव खत्म होने के बाद वरुण गांधी भी सुल्तानपुर पहुंच गए हैं। इसलिए प्रचार ने रफ्तार पकड़ ली है। मेनका भले ही सुल्तानपुर के लिए नई हों, लेकिन वरुण के कामों की उन्हें पूरी जानकारी है। अकबरपुर जाने वाली सड़क की ओर इशारा करके कहती हैं, यह सड़क वरुण ने ही बनवाई थी। 

मेनका के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर अमेठी के पूर्व राजा डॉ. संजय सिंह हैं, तो बसपा के टिकट पर चंद्रभद्र सिंह उर्फ सोनू सिंह। सोनू विधायक रह चुके हैं। बाहुबली नेता हैं। उनके भाई मोनू सिंह पर कई हत्याओं और अन्य संगीन अपराधों के आरोप हैं। जबरन ठेके लेने से लेकर जमीन कब्जा करने के मामले दर्ज हैं। क्षेत्र में दोनों भाइयों का इतना दबदबा है कि लोग अपनी राय बताने में भी हिचकिचाते हैं। सुमेरपुर गांव की चाय की दुकान पर लोग साफ कहते हैं- हमें माफ कीजिए। थोड़ी देर पहले राजनीति को लेकर यहां मारपीट हो चुकी है। एक किसान सुरेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं- यहां वोट मोदी या मायावती के नाम पर नहीं पड़ेंगे।

क्षेत्र में वोट या तो सोनू सिंह के पक्ष में पड़ेंगे या उनके खिलाफ। सुल्तानपुर के सपा के प्रवक्ता अशोक सिंह बिसेन कहते हैं, क्षेत्र में मल्लाहों और निषादों के सवा लाख वोट हैं। गोरखपुर के निवर्तमान सांसद प्रवीण निषाद के सपा छोड़कर भाजपा में शामिल होने से यह वोट अब मेनका को मिलेंगे। कड़े मुकाबले में यह अंतर बहुत मायने रखेगा। अपने सजातीय राजपूत समुदाय के अलावा वे मुसलमान, दलित और यादव वोट पाने का भी दावा कर रहे हैं। सोनू सिंह कहते हैं कि सुल्तानपुर के लोग बाहरी उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं करेंगे। पिछली बार जीतने के बाद वरुण गांधी कभी-कभार घूमने भर आए, लेकिन उन्होंने काम नहीं कराए। 
 
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संजय गांधी की विरासत

मेनका के पास अपनी कर्मठ और विकास के प्रति ईमानदार सांसद की छवि तो है ही, प्रधानमंत्री मोदी के नाम का भी सहारा है। इस बार वे अपने पति का नाम भी जोड़ रही हैं। सभी प्रचार सामग्री पर नाम लिखा है - मेनका संजय गांधी। क्या आप पति की विरासत वापस नहीं पाना चाहतीं क्योंकि अमेठी से लड़ने वाले गांधी परिवार के पहले शख्स संजय ही थे? वे इनकार में सिर हिलाती हैं, देखिए, विरासत काम से बनती है। मेरी विरासत पीलीभीत के विकास कार्य हैं। उससे भी ज्यादा पर्यावरण व पशुरक्षा के काम हैं। हर व्यक्ति को अपनी पहचान खुद बनानी चाहिए। 

उपेक्षित गांधी
मेनका, इंदिरा गांधी के परिवार की वह सदस्य हैं, जो बीस साल से भाजपा के साथ हैं। उनके हृदय में राजीव गांधी के परिवार के प्रति चाहे जैसी भावना हो, चुनाव में वे उनका नाम भी लेना पसंद नहीं करतीं। पूछने पर एक ही जवाब होता है- नो कमेंट्स। लेकिन जो वह शब्दों से संप्रेषित नहीं करतीं, उनकी भाव-भंगिमा से जाहिर हो जाता है। पूछिए कि सुल्तानपुर में टक्कर किन सज्जन से है, वे तपाक से कहती हैं- वे और कुछ भी होंगे, सज्जन तो कतई नहीं हैं।

कुछ लोग होते हैं जो पैसे कमाने के लिए कुछ भी साधन अपनाते हैं और उस कमाई को चुनाव में खर्च करते हैं। हमारी सारी कमाई लोगों का प्यार है। मोदीजी के प्रति लोगों का सम्मान है। और हमारा काम है। वरुण ने काफी काम कराए हैं। पीलीभीत में मेरे काम के बारे भी लोगों को मालूम है। लेकिन पिछली बार तो मोदी लहर थी न? ऐसा आप लोग कहते हैं। मीडिया का 2017 के विधानसभा चुनाव में भी यही कहना था कि कोई लहर नहीं है। लेकिन जब परिणाम आए तो अस्सी प्रतिशत सीटें भाजपा जीती। इस बार भी ऐसा ही होगा। 
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