कभी बसपा के धुरंधरों का गढ़ रहा जिला अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। पार्टी के बड़े नेताओं को बहुजन समाज पार्टी हाईकमान मनाने में नाकाम रहा। नतीजा ये रहा कि लोकसभा चुनाव में बसपा का परंपरागत वोट बिखर गया और बसपा मुकाबले में नहीं खड़ी हो सकी।
एक समय ऐसा था जब अंबेडकरनगर को बसपा की रीढ़ माना जाता था। दलित, अति पिछड़ा, अल्पसंख्यक जो कभी कांग्रेस का वोटर माना जाता था वह बसपा की तरफ शिफ्ट हो गया। इसका सीधा लाभ बसपा को मिला। उसके मुकाबले न तो सपा और न ही कांग्रेस व भाजपा ही कहीं टिक सके। ब्लॉक प्रमुख विधायक से लेकर सांसद तक की सीट पर बसपा का ही कब्जा रहा।
ये भी पढ़ें - अमित शाह मानहानि मामला: कोर्ट में पेश नहीं हुए राहुल गांधी, विशेष अदालत ने सात जून को दिया आखिरी अवसर
ये भी पढ़ें - बसपा के लिए आसान नहीं 7वें चरण का चक्रव्यूह भेद पाना... पिछले चुनाव में इन दो सीटों पर 'हाथी' पड़ा था भारी
समय बदला तो बसपा हाईकमान की पकड़ जिले के कद्दावर नेताओं पर कमजोर होने लगी। उपेक्षा व कमजोर होती पकड़ का नतीजा रहा कि बसपा सुप्रीमो के अत्यंत करीब रहे सांसद त्रिभुवनदत्त ने साथ छोड़कर सपा का दामन थाम लिया। इसके बाद बसपा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व मंत्री लालजी वर्मा, रामअचल राजभर के साथ ही राकेश पांडेय ने भी बसपा का साथ छोड़कर साइकिल पर सवार हो गए। नतीजा यह रहा कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा का गढ़ पूरी तरह से ढह गया। जिले की सभी पांच विधानसभा सीट पर सपा का कब्जा हो गया।
और तो और संसद में बसपा का मजबूती से प्रतिनिधित्व कर रहे सांसद रितेश पांडेय ने भी बीते दिनों भाजपा का दामन थाम लिया। इसके साथ ही लोकसभा चुनाव में भाजपा के मजबूत प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे। उन्हें टक्कर देने के लिए कभी बसपा के मजबूत सारथी रहे लालजी वर्मा सामने आ गए। बसपा का कोई मजबूत खेवनहार न होने का नतीजा रहा कि लोकसभा चुनाव का परंपरागत दलित, अतिपिछड़ा वोटर विखर गया जिसका सीधा लाभ सपा व भाजपा दोनों को मिला।