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UP: कांग्रेस ने खुद मार ली अपने पैरों पर कुल्हाड़ी, मुलायम को समर्थन देने के फैसले से नाराज हो गया था ये समाज

Mon, 18 Mar 2024 12:39 PM IST
शाहरुख खान अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

अब तक आपने पढ़ा कि कैसे कारसेवकों पर गोली चलवाने को लेकर मुलायम सिंह यादव हिंदुओें की नजर में खलनायक और मुसलमानों की नजर में नायक बन गए। कैसे उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बचाई। अब पढ़ें...
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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मुलायम सिंह यादव सरकार को समर्थन देने की कीमत कांग्रेस को चुकानी पड़ी। इस फैसले ने ज्यादातर हिंदुओं के बीच कांग्रेस को अलोकप्रिय बना दिया। कांग्रेस शायद सोच रही थी कि अपने 94 विधायकों के समर्थन की ताकत पर वह मुलायम को  नचाएगी। 
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साथ ही किसी उपयुक्त मौके पर मुद्दा ढूंढकर उनसे समर्थन वापस लेकर अपनी राजनीति करेगी। पर, ऐसा हो नहीं पाया। मुलायम काफी तेज  निकले। कांग्रेस में समर्थन वापस लेने की योजना ही बनती रही, उधर मुलायम ने एक दिन तड़के राजभवन पहुंचकर त्यागपत्र दे उसकी योजना को  ध्वस्त कर दिया। साथ ही कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहने का रास्ता भी तलाश लिया। 

कांग्रेस को कुछ नहीं मिला। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अंबिका प्रसाद तिवारी कहते हैं कि कांग्रेस के तत्कालीन नेतृत्व को शायद लगा था कि वह धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुलायम को समर्थन देकर मुस्लिमों के बीच खोया जनाधार वापस पा लेंगे। 
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पर, वह भूल गए थे कि उनका पाला मुलायम जैसे शातिर सियासी खिलाड़ी से पड़ा है। यह भी भूल  गए कि मुलायम ने कारसेवकों पर गोलियां चलवाकर मुस्लिम समुदाय और भाजपा विरोधी खेमे में काफी गहरी पैठ बना ली है।

लोकसभा के  लिए 1991 में चुनाव हुए  तो भाजपा के सांसदों की जीत का आंकड़ा 1989 के 8 सीटों से बढ़कर 51 पर पहुंच गया। कांग्रेस 5 सीटों पर सिमट गई। विधानसभा के चुनाव में तो 221 सीटों  पर जीत के साथ भाजपा ने अपने बलबूते सरकार बना ली। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बन गए। विधानसभा में कांग्रेस 46 पर सिमट गई।

 

केंद्र में जरूर  कांग्रेस ने सरकार बनाई, लेकिन दूसरों के सहयोग से। भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन गई और पांच साल के भीतर उसने केंद्र में सरकार बनाने का दावा करने  लायक संख्या हासिल कर ली। हालांकि 1996 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार सिर्फ 13 दिन ही चली। 

इसके बाद दो बार  और सरकार बनी। अटल 2004 तक प्रधानमंत्री रहे। साल 1989 से अब तक कांग्रेस कम से कम उत्तर प्रदेश में अस्तित्व की लड़ाई ही लड़ रही है। इस बीच 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में उसे प्रदेश से 21 सीटें जरूर मिलीं।
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केंद्र में 2004 और 2009 में सरकारें भी बनीं, लेकिन प्रदेश में सरकार बनना तो दूर उल्टे विधानसभा में उसका आंकड़ा सिमटता जा रहा है। 
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