गांधी परिवार से जुड़े किशोरी लाल शर्मा विकास के अभाव को नकारते हैं। कहते हैं कि विकास की अधिकतर योजनाएं राज्य सरकारें चलाती हैं। 1989 के बाद प्रदेश में कांग्रेस सरकार नहीं है। गैर-कांग्रेसी सरकारों ने जानबूझकर अमेठी को नजरअंदाज किया, चाहे बात जगदीशपुर इंडस्ट्रियल एरिया हो या सड़कों, नालियों और बिजली सप्लाई की। वे उन योजनाओं की फेहरिस्त दिखाते हैं जो यूपीए के समय स्वीकृत हुईं लेकिन 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से ठप हैं।
अमेठी की उपेक्षा के आरोपों पर कहते हैं, कोई भी अमेठी यात्रा का रिकॉर्ड निकाले। यदि राहुलजी की यात्राएं स्मृतिजी से कम निकलीं तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। यदि मतदाताओं के मूड की बात करें तो भी राहुल की जीत स्पष्ट नजर नहीं आ रही है। इतने कड़े मुकाबले में मतदान के दिन कुछ भी हो सकता है। यदि राहुल यहां से जीत भी जाएं तो भी उनके लिए खतरे की घंटी बज चुकी है।
अमेठी बनाम वायनाड
स्मृति भारतीय नारी की छवि, ग्लैमर और केंद्रीय मंत्री के रुतबे का बखूबी इस्तेमाल करती हैं। उनके भाषणों में विकास का अभाव मुख्य बिंदु है। पूछती हैं कि यदि राहुल अमेठी को अपना परिवार कहते हैं तो इसकी बदहाली उन्हें क्यों नहीं दिखती? कहती हैं कि अमेठी में हार के डर से राहुल वायनाड से लड़ रहे हैं। शायद इसका ही असर है कि कांग्रेसी कहने लगे हैं कि दोनों जगह से जीतने की स्थिति में राहुल अमेठी सीट ही रखेंगे। कारण यह भी है कि वायनाड में चुनाव हो चुका है।
मोदी-स्मृति की लोकप्रियता और राहुल की जीत पर सवालिया निशान के चलते ही कांग्रेस की नवनियुक्त महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पूरे प्रदेश और देश की जगह अमेठी और रायबरेली में डट गई हैं। कभी रोड शो कर उपस्थिति दर्ज कराती हैं तो कभी कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर बूथ स्तर के प्रबंधन का निरीक्षण करती हैं। उन्होंने यहां गांव-गांव में स्व-सहायता समूह बनाए हैं, जिनके जरिए चुपचाप प्रचार करती हैं। अमेठी के लोग भी प्रियंका से सीधे जुड़े हैं।