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लोकसभा चुनाव 2019 : मूर्तियां तो चुनावी मुद्दा बनती हैं, मूर्तिकारों का कहीं नहीं होता जिक्र

Thu, 04 Apr 2019 12:45 AM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
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फाइल फोटो
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चुनाव में मुद्दा बनने वाली मूर्तियों का तो जोर-शोर से जिक्र होता है, पर इन्हें तराशने और खून पसीना बहाकर रंग रूप देने वाली ‘संगतराश’ जातियों की समस्याओं को कोई भी राजनीतिक दल अपने एजेंडे में शामिल नहीं करता है। कमोबेश यही हालत सपेरों और बाढ़ प्रभावित जिलों के छोटे-छोटे समुदायों की भी है। हालांकि चुनावी मौसम में इनकी पूछताछ जरूर बढ़ जाती है।
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यूपी के प्रत्येक चुनाव में जातियों की भूमिका हमेशा अहम रही है। इस बार लोकसभा चुनाव में भी भाजपा, कांग्रेस, सपा व बसपा जैसे दल भी अपने जाति आधारित संगठनों को लेकर मैदान में हैं। अब भी बहुत सी ऐसी जातियां हैं जो गंगा किनारे बसे गांवों के अलावा पहाड़ों की तलछटी व जंगलों के किनारे रहते हैं। सामाजिक तौर पर ये समुदाय अलग-थलग ही दिखते हैं। 

मिर्जापुर के चुनार और अहरौरा के अलावा सोनभद्र के पहाड़ी इलाकों में बहुत से ऐसे कामगारों की बस्तियां हैं, जो दिन-रात पत्थरों को तराश कर राजनेताओं, महापुरुषों और देवी-देवताओं की मूर्तियों को खूबसूरत पहचान देते हैं, लेकिन इनकी आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक स्थिति संवारने की फिक्र किसी को नहीं है।  
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इसी तरह प्रयागराज से लेकर बलिया तक गंगा के कछार वाले गांवों के अलावा आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बस्ती, गोंडा, श्रावस्ती, बहराइच, देवरिया, बलरामपुर, श्रावस्ती, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, लखीमपुर जिलों में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हर साल बाढ़ में सब कुछ गंवा देते हैं, पर यह किसी सियासी दल के एजेंडे में नहीं है। यही स्थिति लखीमपुर खीरी और इटावा समेत जंगली इलाकों में के सपेरों की है, जिन्हें अब तक राजनीतिक तौर पर कोई तवज्जो नहीं मिली।

इसलिए भी उपेक्षित हैं ये जातियां

माना जाता है कि छोटे-छोटे समूहों में बंटी और राजनीतिक तौर पर कम जागरूक होने की वजह से सियासी दलों की नजर इन पर नहीं पड़ती। एकाध परिवारों को छोड़ दें तो अधिकांश परिवारों के युवा अपने पुराने कारोबार में ही जुटे हैं।

असंगठित होने की वजह से नहीं जाती नजर
इन जातियों का अपना कोई संगठन नहीं होने से इनकी आवाज उठाने वाला भी कोई नहीं दिखता। स्थानीय स्तर पर कुछ मजदूर संगठन कभी कभार इनकी मांगों को जिला स्तर पर उठाते हैं, लेकिन ये मांगें दिल्ली और लखनऊ नहीं पहुंच पाती हैं।
 

संगतराश समेत कई जातियां उपेक्षित : भक्त प्रकाश

मिर्जापुर व सोनभद्र में पत्थर तराशने वाले ‘संगतराश’ समुदाय की समस्याओं को उठाने वाले अखिल भारतीय मजदूर ग्रामीण यूनियन के जिला सचिव भक्त प्रकाश कहते हैं कि गरीबी के कारण सुबह से शाम तक दो जून की रोटी जुटाने में ही परेशान रहते हैं।

इसलिए ये राजनीति के बारे में सोचते भी नहीं। इनकी अगली पीढ़ी भी इसी परंपरागत काम में लग जाती है। इसके अलावा दोनों पवर्तीय जिलों के बियार, कोल, मुसहर, नट जैसी जातियों की आजीविका जंगलों से ही चलती है।
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संगठन व नेता न होने से नहीं होती सुनवाई

पिछले 30 वर्षों से सांप पकड़ने वाले लखीमपुर खीरी के दुधवार गांव निवासी धन्नू कहते हैं कि  उनके समुदाय का न तो संगठन है और न ही कोई नेता हैं। हमारे पूर्वज भी सांप पकड़ते--पकड़ते मर गए और हम भी यहीं करते हैं। हमारा समुदाय वर्षों से यही काम करता रहा है। किसी सरकार ने हमारे लिए कुछ नहीं किया। 
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