चुनाव में मुद्दा बनने वाली मूर्तियों का तो जोर-शोर से जिक्र होता है, पर इन्हें तराशने और खून पसीना बहाकर रंग रूप देने वाली ‘संगतराश’ जातियों की समस्याओं को कोई भी राजनीतिक दल अपने एजेंडे में शामिल नहीं करता है। कमोबेश यही हालत सपेरों और बाढ़ प्रभावित जिलों के छोटे-छोटे समुदायों की भी है। हालांकि चुनावी मौसम में इनकी पूछताछ जरूर बढ़ जाती है।
यूपी के प्रत्येक चुनाव में जातियों की भूमिका हमेशा अहम रही है। इस बार लोकसभा चुनाव में भी भाजपा, कांग्रेस, सपा व बसपा जैसे दल भी अपने जाति आधारित संगठनों को लेकर मैदान में हैं। अब भी बहुत सी ऐसी जातियां हैं जो गंगा किनारे बसे गांवों के अलावा पहाड़ों की तलछटी व जंगलों के किनारे रहते हैं। सामाजिक तौर पर ये समुदाय अलग-थलग ही दिखते हैं।
मिर्जापुर के चुनार और अहरौरा के अलावा सोनभद्र के पहाड़ी इलाकों में बहुत से ऐसे कामगारों की बस्तियां हैं, जो दिन-रात पत्थरों को तराश कर राजनेताओं, महापुरुषों और देवी-देवताओं की मूर्तियों को खूबसूरत पहचान देते हैं, लेकिन इनकी आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक स्थिति संवारने की फिक्र किसी को नहीं है।
इसी तरह प्रयागराज से लेकर बलिया तक गंगा के कछार वाले गांवों के अलावा आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बस्ती, गोंडा, श्रावस्ती, बहराइच, देवरिया, बलरामपुर, श्रावस्ती, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, लखीमपुर जिलों में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हर साल बाढ़ में सब कुछ गंवा देते हैं, पर यह किसी सियासी दल के एजेंडे में नहीं है। यही स्थिति लखीमपुर खीरी और इटावा समेत जंगली इलाकों में के सपेरों की है, जिन्हें अब तक राजनीतिक तौर पर कोई तवज्जो नहीं मिली।