सपा से अलग होकर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) का गठन करने वाले शिवपाल यादव के प्रति अपनी निष्ठा जताने वाले बहुत से नेताओं का धैर्य चंद महीने में ही जवाब दे गया। जबकि वे सच्चे सारथी बनने का वादा करके ही प्रसपा में आए थे, लेकिन भाजपा या कांग्रेस में से किसी के साथ गठबंधन न होने से कई नेताओं की निष्ठा बदलने लगी है। कई नेता तो दोबारा सपा में लौटने लगे हैं तो कई वापसी की तैयारी में हैं।
दरअसल, सपा के पुराने कार्यकर्ताओं में कई ऐसे थे जिनकी सहानुभूति शिवपाल के प्रति थी। लिहाजा वे प्रसपा बनते ही शिवपाल के साथ खड़े हो गए थे। कई ऐसे नेता भी इस उम्मीद में प्रसपा में शामिल हुए थे कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन अगर भाजपा या कांग्रेस के साथ हो गया तो चुनाव लड़ना फायदेमंद होगा।
बीच में प्रदेश सरकार ने शिवपाल की पार्टी को प्रमुख स्थान पर कार्यालय देने के बाद तो बहुत से सपा नेताओं को यह विश्वास भी हो गया था कि भविष्य में प्रसपा भाजपा के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ेगी, लेकिन धीरे- धीरे लोकसभा चुनाव को लेकर स्थिति सामने आने के बाद बहुत से नेताओं का यह विश्वास भ्रम साबित हुआ है।
इसी बीच प्रसपा और कांग्रेस के बीच भी गठबंधन होने की बात चली थी, लेकिन इस संभावना को भी कांग्रेस ने झटका दे दिया। इससे कई नेताओं की निष्ठा भी प्रसपा के प्रति खत्म हो गई। खास कर पूर्वांचल के नेताओं की निष्ठा प्रसपा केप्रति तेजी से बदलने लगी है। हाल ही मिर्जापुर प्रसपा की पूरी जिला इकाई इस्तीफा देकर सपा उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा कर चुकी है, वहीं वाराणसी के कद्दावर माने जाने वाले बहादुर यादव ने पिछले दिनों अखिलेश यादव के सामने घर वापसी कर अपनी निष्ठा बदल ली है।
बहादुर पूर्वांचल के बड़े नेता होने के साथ ही मुलायम के जमाने के समाजवादी नेता हैं। इसी नाते शिवपाल ने उन्हें प्रसपा के प्रदेश महासचिव की अहम जिम्मेदारी सौंपी थी। इसी तरह आजमगढ़ से अखिलेश के चुनाव लड़ने की सुगबुगाहट को देखते हुए आजमगढ़, बलिया, मऊ व गाजीपुर के भी कई नेता प्रसपा से सपा में लौटने के जुगाड़ में हैं। मेरठ की कवियित्री अनामिका अंबर ने साफ तौर पर यह कहते हुए ही प्रसपा से चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है कि उन्हें उम्मीद थी कि प्रसपा व भाजपा मिलकर चुनाव लड़ेंगे, लेकिन जब गठबंधन नहीं हुआ तो वह भाजपा के खिलाफ चुनाव नहीं लडे़ंगी।