चुनावी समर के पांचवें चरण के लिए अवध में सियासी मोर्चा सजने लगा है। सेनापतियों के रण में उतरने का सिलसिला शुरू हो गया है। इसी अवध में है अयोध्या व श्रीराम जन्मभूमि स्थल, जिसको लेकर चले आंदोलन ने देश की राजनीति की दिशा ही नहीं बदली, राजनीतिक दलों की दशा भी बदल दी।
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किसी को अर्श से फर्श पर लाकर पटक दिया तो किसी को जमीन से आसमान पर पहुंचा दिया। तुलसी दास की ‘सबहि नचावत राम गोसाईं...’ की तरह। सो नब्बे के दशक से आज तक प्रदेश की सियासत में इसके सहारे नफा तलाशने और नुकसान का खतरा कम करने की कोशिशें होती रही हैं।
भले ही आज मंदिर मुद्दे की बात शुरू होते ही लोगों के दिलो-दिमाग में भाजपा का नाम आ जाता हो, पर श्रीराम जन्मभूमि या राम के नाम पर सियासत की शुरुआत कांग्रेस ने ही की थी। वह भी इसी अवध की राजधानी मानी जाने वाली अयोध्या से प्रख्यात समाजवादी आचार्य नरेंद्र देव को हराने के लिए।
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1946 में उत्तर प्रदेश को संयुक्त प्रांत कहते थे। आचार्य नरेंद्र देव अयोध्या सीट से विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए, पर कांग्रेस की नीतियों से असंतुुष्ट होकर उन्होंने 11 अन्य विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी। साथ ही विधानसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया।
समाजवादी के सामने संत
आचार्य की रिक्त सीट का उपचुनाव घोषित हुआ। कांग्रेस के पास आचार्य नरेंद्र देव को टक्कर देने के लिए कोई कायदे का उम्मीदवार नहीं मिला। पुराने लोग बताते हैं कि कांग्रेस के भीतर एक पक्ष चाहता था कि आचार्य के खिलाफ कोई उम्मीदवार ही न उतारा जाए।
खुद पं. जवाहर लाल नेहरू भी इसी पक्ष के थे। पर, प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत इससे सहमत नहीं थे। पंत ने देवरिया के संत बाबा राघव दास को आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ खड़ा कर दिया। बाबा राघव दास मूल रूप से महाराष्ट्र के रहने वाले थे, पर यूपी में रहने लगे थे। उन्होंने तमाम सामाजिक मुद्दों पर अभियान चलाकर और किसानों की समस्याओं को आवाज देकर अपनी खासी पहचान बना ली थी। उनकी छवि हिंदूवादी थी।
आस्तिक बनाम नास्तिक
सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी आनंद मिश्र ‘अभय’ बताते हैं कि बाबा राघव दास का चुनाव प्रचार करने गोविंद वल्लभ पंत आए। फैजाबाद के चौक में सभा हुई। पंत बोलने खड़े हुए तो आचार्य नरेंद्र देव की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए। उन्हें परम विद्वान व दार्शनिक बताया।
कहा कि आचार्य दुर्लभ प्रतिभा के धनी हैं। पंतजी की बातें सुनकर मंच पर बैठे बाबा राघव दास बेचैन दिख रहे थे। वह बार-बार पंत की तरफ देख रहे थे। तभी पंत ने भाषण की दिशा बदली और बोले, ‘तमाम गुणों के बाद भी आचार्य में एक अवगुण है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।
आचार्य मार्क्सवादी हैं। साथ ही नास्तिक भी। वह ईश्वर को नहीं मानते। धर्म को नहीं मानते और उनका राम को मानने का तो सवाल ही नहीं है। वह अयोध्या से जीतकर गए तो यहां की धर्मध्वजा नीची हो जाएगी। इसलिए बाबा राघव दास को जिताइए ताकि राम नाम की पताका नीची न होने पाए।’ इसी के बाद अयोध्या में गली-गली नारे लगे, ‘आस्तिक जीतेगा और नास्तिक हारेगा।’
बताया जाता है कि गोविंद वल्लभ पंत ने कई सभाओं में इशारों में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर बनवाने का वादा भी किया। जाहिर है, वोटों का ध्रुवीकरण कराने के लिए इतना काफी था। बाबा राघव दास चुनाव जीत गए और आचार्य नरेंद्र देव हार गए।
इसी के बाद दिसंबर 1948 में एक रात अयोध्या के विवादित स्थल पर मूर्तियां प्रकट हो गईं। चुनाव के बाद कांग्रेस के कई बड़े नेताओं, संतों और बाबा राघव दास की मंदिर निर्माण को लेकर बैठकें हुईं। मंदिर निर्माण का रास्ता नहीं निकल सका। सभी को पता है कि राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, उसी समय श्रीराम जन्मभूमि का ताला खुला।
कांग्रेस ने इसका श्रेय लेने की कोशिश की। शिलापूजन का भी श्रेय लेने का प्रयास किया। नब्बे के दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने ‘रामलला हम आएंगे-मंदिर वहीं बनाएंगे’ नारे के माहौल से जमीन तैयार कर चुनाव लड़ा और कांग्रेस को झटका देने के साथ बाकी दलों को पटकनी दी। आज भी सियासी दल इस मुद्दे को अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल करने की कोशिश करते रहते हैं।