इसी तरह बसपा की बुनियाद ही परिवारवाद के खिलाफ मानी जाती रही है। कांशीराम से लेकर मायावती तक की घर-परिवार त्यागकर पार्टी को आगे बढ़ाने की मुहिम अर्से तक मिसाल दी जाती रही। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में पार्टी के इस सिद्धांत में बदलाव हुआ।
माया ने भतीजे आकाश आनंद को पहले पार्टी गतिविधियों में सामने लाना शुरू किया। फिर 16 अप्रैल को आगरा की जनसभा में आनंद को अपने विकल्प में बतौर वक्ता उतारकर यह खुला संदेश दे दिया कि उनके बाद लोगों को पार्टी का भविष्य आकाश को मान लेना चाहिए।
माया ने इस चुनाव में खुद को पीएम पद के दावेदार के तौर पर पेश किया और इसके लिए पीएम मोदी के खिलाफ विपक्षी नेताओं में ममता बनर्जी के बाद सर्वाधिक मुखर मोर्चा खोला।
माया हमेशा भाषण पढ़कर देती हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी वह लिखा ही पढ़ती हैं। समझा जा सकता है कि उनके मुंह से निकली हर बात बहुत सोची-समझी होती है। मगर इस चुनाव में माया भी धार्मिक आधार पर मतदाताओं के ध्रुवीकरण के लोभ से बच नहीं पाईं। इस आरोप में उन्हें भी चुनावी प्रचार पर प्रतिबंध झेलना पड़ा।
बढ़ा सम्मान
बसपा का बड़ा से बड़ा नेता मायावती के पैर छूकर आशीर्वाद लेता रहा है। लेकिन यह पहला चुनाव था जिसमें दूसरे दलों के दिग्गज नेता भी माया के पैर छूकर आशीर्वाद लेते दिखे। सपा-बसपा गठबंधन के एलान के बाद राजद नेता तेजस्वी यादव और चुनाव प्रचार के दौरान सपा मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव मायावती की पैर छूती नजर आईं। सामाजिक व राजनीतिक फलक पर इसे बड़े बदलाव के तौर पर महसूस किया गया।
मायावती सोशल मीडिया से इस चुनाव से पहले दूर रहती थीं। पर इस बार वे ट्विटर पर आईं और पूरे चुनाव सक्रिय रहीं। यह सक्रियता जारी है। अब तक उनके 2.71 लाख फॉलोवर हो चुके हैं।