लोहिया इंस्टीटयूट ने जूनियर रेजीडेंट को नौकरी से हटाया।
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ब्लैक फंगस के इलाज में इस्तेमाल होने वाले इंजेक्शन की कालाबाजारी के आरोप में गिरफ्तार किए गए रेजीडेंट डॉ. वामिक हुसैन को लोहिया संस्थान ने नौकरी से हटा दिया है।
मामले में केजीएमयू के दो संविदाकर्मियों की मिलीभगत भी सामने आई है। लोहिया संस्थान के अफसरों का कहना है कि कोरोना व ब्लैक फंगस समेत सभी महंगी दवाओं की निगरानी कराई जा रही है। एक-एक इंजेक्शन का रिकॉर्ड भी मांगा जा रहा है।
ब्लैक फंगस के इलाज में इस्तेमाल होने वाले लाइपोसोमल एम्फोटेरेसिन-बी इंजेक्शन की मांग इन दिनों काफी अधिक है। सरकारी चिकित्सा संस्थानों में सरकार द्वारा इंजेक्शन की आपूर्ति की जा रही है।
निजी अस्पतालों में मरीजों के लिए 6000 रुपये में इंजेक्शन रेडक्रॉस से मिल रहे हैं। मांग अधिक होने पर रेडक्रॉस आपूर्ति नहीं कर पा रहा है जबकि बाजार में बिक्री बंद है।
यही कारण है कि इंजेक्शन की कालाबाजारी जोरों पर हैं। बुधवार को पुलिस ने लोहिया संस्थान के रेजीडेंट डॉ. वामिक हुसैन को इंजेक्शन की कालाबाजारी के आरोप में गिरफ्तार किया।
इसके बाद लोहिया संस्थान ने उसे नौकरी से हटा दिया। यह डॉक्टर इमरजेंसी मेडिसिन विभाग में जूनियर रेजीडेंट के पद पर करीब डेढ़ साल से काम कर रहा था।
संस्थान के प्रवक्ता डॉ. श्रीकेश सिंह का कहना है कि मामले की जांच चल रही है और भर्ती व ओपीडी मरीज के सीरियल नंबर से स्टोर से दवाएं जारी होती हैं।
बिना सीआर नंबर दवाएं स्टोर से निर्गत नहीं होती। ऐसे में संस्थान के जरिए इंजेक्शन व दवाएं लेकर बाहर बेंचने का सवाल नहीं उठता।