राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय प्लेसमेंट दिलाने में फेल
राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने के लिए छात्र महंगी कोचिंग करते हैं, प्रवेश परीक्षा की तैयारी में कई साल खपा देते हैं। यहां शिक्षा ग्रहण करना उनके लिए सपने के साकार होने जैसा है। मगर राजधानी के प्रतिष्ठित डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में पढ़ने के बाद भी छात्रों को नौकरी पाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। यहां के शिक्षकों और छात्रों की मानें तो कैंपस प्लेसमेंट के मामले में विवि फेल साबित हो रहा है।
लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 2006 में की गई थी। इसके निर्माण पर करीब 300 करोड़ रुपये खर्च किए गए। छात्रों की मानें तो पिछले चार सालों से सुचारू रूप से न तो कैंपस प्लेसमेंट आयोजित किए गए और न ही प्लेसमेंट ड्राइव चलाई गई। छात्र अपने स्तर से कंपनियों व फर्म्स में रोजगार के लिए आवेदन करते हैं या फिर इंटर्नशिप के जरिए अपनी काबिलियत के दम पर रोजगार हासिल करते हैं। शिक्षकों की मानें तो इस तरह से रोजगार हासिल करने वाले छात्रों को ही विवि प्रशासन अपना कैंपस प्लेसमेंट बताकर श्रेय लेता है।
नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) के अनुसार विवि के मौजूदा छात्रों का प्लेसमेंट प्रतिशत महज 11 प्रतिशत ही है। विधि विश्वविद्यालयों व संस्थानों की रैंकिंग में यह 14 पायदान पर है।
यहां यूजी और पीजी पाठ्यक्रमों के साथ ही पीएचडी में भी दाखिला लिया जाता है। यहां यूजी में एलएलबी ऑनर्स कोर्स संचालित होता है, जिसमें 160 सीटें हैं। वर्ष 2006 में दाखिला क्लैट के माध्यम से नहीं लिया गया। पहला बैच 2011 में उत्तीर्ण होकर निकला। इसी वर्ष में पहला कैंपस प्लेसमेंट आयोजित किया गया। साक्षात्कार के जरिए करीब 72 बच्चों का विभिन्न कंपनियों में प्लेसमेंट हुआ। छात्रों को अधिकतम 11 से 12 लाख रुपये का सालाना पैकेज ऑफर किया गया। इसके बाद से विवि की प्लेसमेंट की व्यवस्था बेपटरी होती गई।
प्लेसमेंट सेल ध्वस्त हो गया। न कोई पूर्णकालिक प्लेसमेंट ऑफिसर नियुक्त किया गया और न ही कंपनियों को परिसर में आमंत्रित करने के लिए सुनियोजित रणनीति बनी। वर्ष 2012 से लेकर 2014 तक किसी तरह कैंपस प्लेसमेंट आयोजित कर कोरम पूरा किया गया और छात्रों की दिलचस्पी इसमें कम होती गई। चयनित छात्रों की संख्या घटती चली गई और हालत यह हो गई कि प्लेसमेंट की संख्या 10 छात्रों से भी कम हो गई। छात्रों की समिति बनाकर कैंपस प्लेसमेंट आयोजित करने का जिम्मा पूरी तरह उन्हीं पर डाल दिया गया। जिन शिक्षकों को प्लसेमेंट ऑफिसर की जिम्मेदारी सौंपी जाती वे दिलचस्पी नहीं लेते थे। एक स्थाई समिति और पूर्णकालिक प्लेसमेंट ऑफिसर न होने की वजह से कैंपस प्लेसमेंट आयोजित होना बंद हो गया। पिछले चार वर्षों से कोई प्लेसमेंट ड्राइव नहीं चलाया गया। एनआईआरएफ के अनुसार 2016 में 31, 2017 में 13 और 2018 में मात्र 17 छात्रों को प्लेसमेंट मिला।
इंटर्नशिप के सहारे खोजते हैं रोजगार
छात्रों ने बताया कि वे इंटर्नशिप के सहारे रोजगार खोजते हैं। इसमें शिक्षक भी मदद करते हैं। शिक्षकों के रेफरेंस से वे फर्म्स व कंपनियों में इंटर्नशिप के लिए आवेदन करते हैं। इसी दौरान वे अपनी योग्यता के दम पर रोजागार हासिल करते हैं। शिक्षकों ने बताया कि छात्र अपने स्तर पर देश-विदेश की कंपनियों व फर्म्स में आवेदन कर रोजगार प्राप्त करते हैं।
एनआईआरएफ में गिरी विवि की रैंकिंग
कोई भी विश्वविद्यालय अपने गुणवत्तापरक शोध कार्य और उत्कृष्ट प्लेसमेंट की संख्या की बदौलत साख बनाता है। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) द्वारा जारी विधि विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में इस बार लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय छह पायदान नीचे खिसक गया है। वर्ष 2019 की रैंकिेंग में विवि 14वें पायदान है। मानव संसाधन मंत्रालय ने इसे कुल 52.39 अंक दिए हैं। जबकि वर्ष 2018 की रैंकिंग में विवि आठवें पायदान पर था। उसे कुल 54.82 अंक प्राप्त हुए थे।
विवि का दावा, सुधर रही व्यवस्था
विवि प्रशासन ने कैंपस प्लेसमेंट को लेकर व्यवस्था पटरी पर आने का दावा किया है। विवि के वीसी प्रो. एसके भटनागर ने बताया कि वीसी का चार्ज संभालने के बाद सभी कमेटियों का नए सिरे से गठन किया गया। प्लसमेंट एंड इंटर्नशिप कमेटी का भी गठन हो चुका है, जिसके चेयरमैन डॉ. एके पांडेय हैं। इनके अलावा डॉ. अपर्णा सिंह, डॉ. मिताली तिवारी और डॉ. मानवेंद्र कुमार तिवारी बतौर सदस्य नियुक्त हैं। प्लेसमेंट की सारी गतिविधियां करने और उसके लिए रणनीति बनाने का जिम्मा इस कमेटी पर है। कमेटी का दावा है कि अब स्थितियां काफी सुधर रही हैं।
कराते हैं ऑन और ऑफ कैंपस प्लेसमेंट
विवि दो तरह की प्लेसमेंट देता है। इंटर्नशिप के जरिए ऑफ कैंपस प्लेसमेंट और प्लेसमेंट ड्राइव के जरिए ऑन कैंपस प्लेसमेंट। जब कोई कंपनी या फर्म आती है तो उससे पहले ही प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है और छात्रों को बता दिया जाता है। इसमें सम्मिलित होने वाले छात्रों की संख्या कम होती है।
- डॉ. एके पांडेय, चेयरमैन, इंटर्नशिप एंड प्लेसमेंट कमेटी