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लॉकडाउन से पश्चिमी यूपी में हस्तशिल्पियों का अर्थतंत्र लड़खड़ाया, सैकड़ों करोड़ का नुकसान

Tue, 12 May 2020 05:16 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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हस्तशिल्प के कारोबार से जुड़े उद्यमी। - फोटो : amar ujala
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उत्तर प्रदेश में पूरब की तरह पश्चिम क्षेत्र के कई जिलों के शिल्पी अपनी परंपरा को आधुनिकता से जोड़ते हुए देश-दुनिया में पहचान बना रहे हैं। साथ ही प्रदेश के राजस्व में भी योगदान कर रहे हैं। मगर, कोरोना महामारी के चलते 40 दिनों से चल रहे लॉकडाउन ने इनके अर्थतंत्र को बिगाड़ दिया है। सैकड़ों करोड़ के कारोबार को नुकसान पहुंचा है।

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बात आगरा व बरेली के जरी-जरदोजी से जुड़े कारीगरों की या फिरोजाबाद के कांच, अलीगढ़ के ताले, संभल में सींग व हड्डी, मैनपुरी के तारकशी, मुरादाबाद में धातु और बिजनौर की काष्ठकला से जुड़े शिल्पी बकाया फंसने, ऑर्डर कैंसिल और पूंजी न होने की समस्या से जूझ रहे हैं।

इनका कहना है कि वे बड़े पूंजीपति नहीं हैं। पर, इनके काम से लाखों परिवार पल रहे हैं। सरकार बड़े उद्योगों की तरह मदद दे तो काफी जल्द खड़े होने में सक्षम हैं। वर्ना वे टूट जाएंगे और हजारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। महेंद्र तिवारी की रिपोर्ट...

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कांच कारीगरों के लिए रॉ मैटेरियल बड़ी चुनौती : राजन

राजन यादव व सुनील दत्ता। - फोटो : amar ujala
फिरोजाबाद के राजन यादव बताते हैं कि कांच के खिलौनों, मूर्तियों, चूड़ियों व ग्लास पर डिजाइन-डेकोरेशन के कार्यों से लगभग एक लाख लोग जुड़े हैं। प्रोडक्ट फैक्टरियों में तैयार होता है, डिजाइन शिल्पी करते हैं। इनमें 70 प्रतिशत रोज कमाने-खाने वाले हैं। इन्हें फैक्ट्रियों के चलने का इंतजार है। पर, चुनौती कम नहीं है। पिछले 10-12 वर्ष से रॉ मैटेरियल चीन से आ रहा था। वह क्वालिटी में भारत में बनने वाले रॉ मैटेरियल से अच्छा और सस्ता होता है। चीन का रॉ मैटेरियल 55-60 रुपये प्रति किलो, जबकि भारत में बना 350 रुपये/किलो पड़ता है।

मौजूदा समय में चीन के साथ जिस दिशा में संबंध बढ़ रहे हैं, उससे रॉ मैटेरियल की चिंता सबसे ज्यादा है। इसी तरह इंडस्ट्री व कारीगर को फ्लेम वर्क के लिए ऑक्सीजन व एलपीजी की जरूरत होती है। एलपीजी मिल जाती है, लेकिन ऑक्सीजन के दाम में काफी फर्क आता है। बल्क में फैक्टरियों को 150 रुपये सिलेंडर मिलता है, जबकि फुटकर कारीगरों को यह 300-350 रुपये में मिलता हैं। मुंबई व कोलकाता काफी माल जाता था। मार्केट, ग्लास की दुकानें व शोरूम बंद हैं। सरकार को इस सेक्टर को प्रोत्साहन देने के लिए उत्पाद की ऑनलाइन खरीद व विपणन की व्यवस्था करानी चाहिए। साथ ही तीन-चार महीने कारीगरों को कुछ आर्थिक सहायता देनी चाहिए।

विधिवत काम के लिए पूरी चेन को सुचारु करने की जरूरत : सुनील
अलीगढ़ ताला उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। तालानगरी औद्योगिक विकास एसोसिएशन के महामंत्री सुनील दत्ता बताते हैं कि देश की कुल आवश्यकता का 95 फीसदी ताला यहां तैयार होता है। 50,00 करोड़ के इस कारोबार में 1.5 लाख लोग लगे हैं। प्रशासन ने इकाइयों को नए सिरे से चलने के लिए इस तरह शर्तें रखी हैं कि अमल बेहद मुश्किल है।

दूसरा फैक्टरी के लिए रॉ मैटेरियल, एंसिलिरी वेंडर पर निर्भरता रहती है। वहां दुकानें नहीं खुल रही हैं। इससे अभी तक 10 इकाइयां भी शुरू नहीं हो पाई हैं। जो प्रोडक्ट गया, उसका पैसा नहीं आ रहा है। जो पूंजी थी, लॉकडाउन में खर्च हो गई। ऑर्डर नहीं आ रहे हैं और बिना पूंजी काम किस तरह हो, यह बड़ा सवाल है। मार्च से अब तक लगभग 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। इकाइयों का विधिवत संचालन शुरू करने के लिए सरकार को पूरी चेन सुचारु बनानी चाहिए।

निर्यात के पुराने ऑर्डर स्थगित तो नया काम कैसे हो : इरशाद

इरशाद अली मुल्तानी व फातमा जहरा। - फोटो : amar ujala
बिजनौर का नगीना काष्ठकला के लिए जाना जाता है। यहां के शिल्पी इरशाद अली मुलतानी बताते हैं कि इस काम में लगभग 6,000 लोग जुड़े हैं और 200 करोड़ का कारोबार होता है। इसका अधिकतम निर्यात अमेरिका, इजरायल, जर्मनी, फ्रांस व खाड़ी देशों को जाता है। मगर, बड़ी संख्या में निर्यात के ऑर्डर स्थगित कर दिए गए हैं। इससे काम बढ़ाने की गुंजाइश नहीं है। कारीगर घर बैठने को मजबूर हैं। इस सेक्टर की मदद के लिए सरकार को पैकेज घोषित करना चाहिए।

जरी-जरदोजी के कारीगरों की आर्थिक मदद दे सरकार : फातमा
बरेली में जरी-जरदोजी का बड़ा कारोबार है। इससे जुड़ी फातमा जहरा बताती हैं कि लगभग 3.5 लाख लोग कारोबार से जुड़े हैं। इनमें ढाई लाख रोज और हफ्ते की कमाई से परिवार चलाने वाले हैं। लॉकडाउन से पूरा काम बंद है। आगे कैसे शुरू होगा, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा।

सरकार बाहर से आने वाले श्रमिकों राशन व 1000-1000 रुपये की मदद कर रही है। इसी तरह शिल्पियों को भी कुछ आर्थिक मदद दी जानी चाहिए, जिससे उनका भी परिवार चल सके। सैकड़ों करोड़ के कारोबार में निर्यात भी अच्छा होता है, लेकिन निर्यात के ऑर्डर स्थगित किए जाने से मुश्किलें बढ़ेंगी। फिर इसका असर कारीगर तक होगा। लिहाजा सरकार को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। 

कारीगर-कारखानेदार को नहीं मिल रहे पास, कैसे चलें उद्योग : शाहनवाज

शाहनवाज अहमद खां व कमल किशोर वार्ष्णेय। - फोटो : amar ujala
मुरादाबाद में मेटल प्रोडक्ट के मैन्युफैक्चरर व रियल आर्टिजन वेलफेयर ट्रस्ट के महामंत्री शाहनवाज अहमद खां बताते हैं कि यहां पीतल, एल्युमिनियम व आयरन के प्रोडक्ट बनते हैं। इस इंडस्ट्री से लगभग 6000 करोड़ रुपये के उत्पाद का निर्यात होता है। इससे करीब 4.5 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है। इनमें लगभग 50 हजार लोग फैक्टरियों में काम करने वाले हैं। शेष लोग घर-घर कुटीर उद्योग की तरह काम करते हैं।

प्रोडक्ट बनाने वाले कारीगर अपना सामान कारखानेदार (बिचौलिये) को देता है। कारखानेदार प्रोडक्ट फैक्ट्री को पहुंचाता है। फैक्ट्री में प्रोडक्ट को अंतिम रूप मिलता है। यहां अप्रैल से अक्तूबर तक बिजनेस पीक पर रहता है। लॉकडाउन से अब तक 450 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। खां बताते हैं कि कारीगरों को काम का पैसा सप्ताह के हिसाब से कारखानेदार के जरिये मिलता है। पर वर्तान में उन्हें बकाया पैसा नहीं मिल रहा है। सीएम के निर्देश पर इंडस्ट्री खुल गई, लेकिन कारीगर और कारखानेदार का पास जारी नहीं हो रहा है। नतीजतन उत्पादन शुरू नहीं हो पा रहा।

सींग-हड्डी से बनी वस्तुओं के निर्यात के लिए कदम उठाए सरकार : कमल
संभल सींग और हड्डी से बनी वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है। हैंडीक्राफ्ट वेलफेयर एसोसिएशन संभल के उपाध्यक्ष कमल कौशल वार्ष्णेय बताते हैं कि लगभग 300 करोड़ के होम डेकोरेशन व इमिटेशन ज्वैलरी से 8000 परिवारों को रोजगार मिल रहा है। यहां से करीब 100 करोड़ रुपये के उत्पाद का निर्यात सिर्फ अमेरिका और मुस्लिम देशों को होता है। मगर लॉकडाउन की वजह से आयातक ऑर्डर कैंसिल करा रहे हैं। जो प्रोडक्ट पहले भेजा गया, उसके भुगतान में भी देरी कर रहे हैं। इस हस्तशिल्प की ईद पर काफी मांग रहती है, अब निर्यात होने के बावजूद समय पर प्रोडक्ट पहुंचने की उम्मीद कम है। इंडस्ट्री शुरू हो गई है, लेकिन लेबर नहीं हैं। ऐसे में सरकार को निर्यात प्रोत्साहन से जुड़े कदम उठाने चाहिए।
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बने उत्पाद के खरीदार नहीं, कर्ज बढ़ रहा, सरकार करे मदद : नेमीचंद्र

नेमीचंद्र व बिलाल। - फोटो : amar ujala
मैनपुरी में तारकशी का हस्तशिल्प प्रसिद्ध है। लकड़ी के खड़ाऊं, चौकी, चूड़ी बाक्स, मेजें आदि की नक्काशी पीतल के तार की जाती है। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हस्तशिल्पी व तारकशी के मास्टर क्रॉफ्टमैन नेमीचंद्र शाक्य बताते हैं कि कभी यह हस्तशिल्प हर घर की शान हुआ करता था, लेकिन बिक्री घटने से लोग इस काम को छोड़कर दूसरे काम में लग गए।

मौजूदा समय में लगभग 600-700 लोग ही इस शिल्प से जुड़े हैं। इधर वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट स्कीम शुरू हुई तो प्रोत्साहन मिला। तमाम शिल्पियों ने पूंजी के लिए फाइनेंस कराया। जीआई रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन किया गया, लेकिन लॉकडाउन ने मुसीबत खड़ी कर दी है। सामान बना पड़ा है, खरीददार नहीं है। जबकि कर्ज का ब्याज बढ़ रहा है। कई शिल्पियों के घर खाने के भी लाले पड़ गए हैं। मुश्किल की इस घड़ी में सरकार से उम्मीद है।

जरदोजी शिल्पियों के प्रोत्साहन के लिए कदम उठाए सरकार : बिलाल
आगरा के जरदोजी शिल्पी स्टोन काजिंग, पच्चीकारी आदि से लोगों को लुभाते हैं। यहां शिल्पी बिलाल अहमद बताते हैं कि 50 हजार से अधिक लोग इस काम से जुड़े हैं। इनमें करीब 5,000 महिलाएं हैं। काम ठप होने से ये मुश्किल में हैं। अहमद बताते हैं कि गोल्डन कलर के जरदोजी प्रोडक्ट खाड़ी देशों और पशुओं से जुड़ी आकृतियां यूरोपियन देशों में निर्यात की जाती हैं। दुपट्टा, कुशन कवर, लहंगा, ब्लाउज, शेरवानी की काफी डिमांड रहती है। वहीं, यहां आने वाले विदेशी पर्यटक भी बड़े ग्राहक होते हैं। पर्यटकों का आना बंद हो गया है। घरेलू मार्केट के पुराने ऑर्डर रोक दिए गए हैं। बकाया पेमेंट अटक गया है और नया ऑर्डर मिल नहीं रहा है। सरकार को शिल्पियों के प्रोत्साहन के लिए कदम उठाना चाहिए।

ये मदद चाहते हैं शिल्पी
- निर्यात से जुड़े प्रोडक्ट को वेरीफाई करने वाली इंपोर्ट एजेंसियां को आने-जाने की अनुमति दी जाए।
- शिल्पियों को मांग के अनुरूप नई डिजाइन और नई तकनीक का प्रशिक्षण दिलाया जाए।
- जो ऋण चल रहा है, उसकी किस्त जमा करने की समय सीमा एक वर्ष बढ़े। लॉकडाउन पीरियड का एक वर्ष का ब्याज माफ हो।
- उत्पाद बिक्री के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए।
- महामारी पर नियंत्रण होते ही मेलों, प्रदर्शनियों व महोत्सव आयोजन हो। इसमें शिल्पियों को शामिल होने के लिए मदद मिले।
- निर्यातकों को ब्याज पर 5 प्रतिशत इन कैश सब्सिडी मिलने की समयसीमा 31 मार्च को खत्म हो गई है। इसे तीन वर्ष के लिए बढ़ाया जाए।
- निर्यातकों को नई पूंजी के लिए ओवरड्राफ्ट या ब्याजमुक्त ऋण की व्यवस्था की जाए।
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