केजीएमयू के स्त्री कैंसर रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. निशा सिंह के अनुसार, एलएनजी-आईयूएस का उपयोग पहले मासिक धर्म की अनियमितता और अत्यधिक रक्तस्राव के इलाज तक सीमित था, लेकिन अब इसे शुरुआती चरण के गर्भाशय कैंसर में फर्टिलिटी प्रिजर्विंग ट्रीटमेंट के रूप में देखा जा रहा है।
डिवाइस की कीमत करीब तीन हजार रुपये है
गर्भाशय कैंसर के मानक इलाज में आमतौर पर हिस्टेरेक्टॉमी के जरिये गर्भाशय को निकालना पड़ता है, जिससे महिला हमेशा के लिए मां बनने की क्षमता खो देती है। लेकिन अब चुने हुए शुरुआती मामलों में यह डिवाइस सर्जरी को टालने का मौका देती है। केजीएमयू में अब तक दो रोगियों में इसका सफल उपयोग किया जा चुका है। खास बात यह है कि यह इलाज बहुत महंगा भी नहीं है। डिवाइस की कीमत करीब 3,000 रुपये है।
सफलता दर और सीमाएं
डॉ. निशा सिंह बताती हैं कि यह इलाज हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं है। यह केवल उन्हीं महिलाओं में किया जा सकता है, जिनमें कैंसर बेहद शुरुआती अवस्था में हो और जो नियमित फॉलोअप के लिए तैयार हों। इस उपचार की मौजूदा सफलता दर करीब 70 प्रतिशत है। यह कैंसर की बढ़त रोक सकता है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं करता। इसकी सफलता दर को बढ़ाने के लिए लगातार शोध जारी हैं।
ऐसे करता है काम
टी आकार की यह डिवाइस छह महीने के लिए गर्भाशय के भीतर रखी जाती है। यह धीरे-धीरे लेवोनोर्गेस्ट्रेल नामक सिंथेटिक हार्मोन छोड़ती है, जिससे गर्भाशय की परत की असामान्य वृद्धि रुकती है और परत पतली होती जाती है। शुरुआती मामलों में इससे कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि धीमी पड़ सकती है या रुक सकती है। इससे तत्काल सर्जरी की जरूरत टल जाती है और इस दौरान मां बनने की इच्छुक महिलाएं आईवीएफ के जरिये गर्भधारण कर सकती हैं।