वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी को लखनऊ आए हुए लगभग एक दशक होने को है पर लखनऊ के लोगों को इस लंबे अरसे में भी शायद ही कभी ये एहसास हुआ हो कि अटल उनसे दूर हैं। हो भी क्यों न।
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भले ही अटल का जन्म लखनऊ से 500 किमी. यमुना के किनारे बटेश्वर में हुआ परंतु बीते 60 साल से ज्यादा उनकी सांस और लखनऊ की धड़कन को शायद ही कभी कोई अलग करके देख पाया हो। यही वजह रही कि देश के दूसरे राज्यों के लोग ही नहीं विदेशों में भी अटल बटेश्वर के कम लखनऊ वाले ही ज्यादा जाने गए।
यह स्वाभाविक भी है। आखिरकार किशोर अटल से प्रधानमंत्री अटल तक की यात्रा भी इसी लखनऊ ने पूरी की है। अटल के कदम से कदम मिलाकर चलने वाले स्व. बजरंग शरण तिवारी ने एक बार बताया था कि लखनऊ और अटल यूं ही नहीं एक दूसरे के पर्याय माने जाते हैं।
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बकौल तिवारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बद्री प्रसाद और स्व. भाऊराव देवरस के साथ अटल बिहारी का लखनऊ आना जाना 1945 के आसपास शुरू हो गया था। तब से आज तक लखनऊ ने उनके कई रूप देखे।
लखनऊ में ही बने जिद्दी हिंदी सेवक
देखे क्या, यूं कहें कि अटल के कई रूपों के सफर का साक्षी बना लखनऊ। एक स्वयंसेवक के रूप में, यहां के प्रचारक, कार्यकर्ता, पत्रकार व संपादक, राजनेता और फिर अपने सांसद के रूप में।
लखनऊ से उनका नाता बस इतना भर ही नहीं है। दोस्तों के साथ मौज-मस्ती, अमीनाबाद से गणेशगंज के रास्ते पर शंभू हलवाई की दुकान पर दोस्तों के साथ रबड़ी व मलाई की दावत और फिर गलियों की घुमक्कड़ी भी अगर किसी ने देखी है तो इसी लखनऊ ने।
सिर्फ कवि अटल को ही लखनऊ ने नहीं देखा अपितु एक जिद्दी ‘हिंदी’ सेवक के रूप में भी अटल का अवतार अगर किसी ने देखा तो लखनऊ ने ही। बात कुछ यूं है।
प्रदेश में उर्दू को द्वितीय राजभाषा घोषित करने के विरोध में प्रसिद्ध हिंदी विद्वान श्रीनारायण चतुर्वेदी ने ‘भारत-भारती’ सम्मान वापस कर दिया। सूचना अटल जी को मिली तो आ पहुंचे लखनऊ। ऐलान किया कि चतुर्वेदी जी को ‘जनता भारत-भारती’ सम्मान दिया जाएगा।
कंधे पर अखबार का बंडल लादकर जाते थे
लखनऊ तो हमेशा ही अटल के मुंह की तरफ देखा करता था। अटल के मुंह से बात निकलने भर की देर थी कि लखनऊ के लोग रुपये लेकर पहुंचने लगे। अटल एक बार फिर अपने ऐलान पर ‘अटल’ होकर सामने आए। ‘जनता भारत-भारती’ के लिए निर्धारित एक लाख रुपये से काफी ज्यादा धन एकत्र हो गया।
पत्रकार के रुप में उनका सफर यहां 1947 में संघ की तरफ से प्रकाशित ‘राष्ट्रधर्म’ पत्रिका से शुरू हुआ। आगे चलकर पांचजन्य, स्वदेश और तरुण भारत के संपादक के रूप में भी लखनऊ ने अपने अटल को देखा। पर लखनऊ अटल के लिए अच्छा ही अच्छा नहीं रहा।
यहां की गलियों में संघर्ष के दिनों में अटल को अपने बीच से पैदल गुजरते भी देखा। यहां के लोगों ने पैसे के अभाव में अखबार का बंडल कंधे पर लादकर सदर से एपी सेन रोड तक पैदल जाने वाले अटल को भी देखा।
ट्रेडिल मशीन चलाकर अखबार व पत्रिका छापने की धुन, एक एक टाइप को जोड़कर कंपोजिंग करने वाले ‘कंपोजिटर’ को भी अगर किसी ने देखा तो सिर्फ लखनऊ ने।
दिलचस्प तो यह है कि लखनऊ उन्हें चुनावी यात्रा के पहले पड़ाव में ही झटका भी दिया। हालांकि, पूर्व महापौर व अटल के बचपन के साथी डॉ. दाऊजी गुप्त कहते हैं कि लखनऊ वाले उन्हें अपने से दूर जाने नहीं देना चाहते थे।
इसीलिए उन्हें 1952 में लखनऊ संसदीय सीट के उपचुनाव में स्वराजवती नेहरू के मुकाबले जीतने नहीं दिया पर इसी लखनऊ ने उन्हें 1991 से 2004 तक लगातार अपना सांसद बनाया।
विपक्ष के नेता से लेकर प्रधानमंत्री तक के सफर में लखनऊ वालों ने अटल के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। भाजपा कार्यकर्ता अमित पुरी कहते हैं कि इस कविता ‘हे प्रभु तुम मुझे इतनी ऊंचाई न देना कि अपनों को गले न लगा सकूं हे प्रभु तुम मुझे इतनी रुखाई न देना कि मैं गैरों को गले न लगा सकूं’ की यात्रा भी लखनऊ में ही शुरू हुई थी। बात सही भी है।
भले ही अटल ने लखनऊ में हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन... कविता गुनगुनाई हो लेकिन वह इस शहर के हर वाशिंदे के दिल पर राज करते हैं। वह चाहे हिंदू हो या मुस्लिम या फिर कोई और। तभी तो अटल को भारत रत्न पर शायद आज सबसे ज्यादा नाज लखनऊ को है।
राष्ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी ने अटल को घर जाकर भारत रत्न प्रदान कर लखनऊ वालों को अभिभूत कर दिया है। साथ ही बकौल भाजपा विरोधी दाऊ जी गुप्त या भाजपा कार्यकर्ता अमित पुरी, यह भी साबित कर दिया कि लोकतंत्र कभी परंपराओं का दास नहीं होता।