लोकसभा चुनाव की दस्तक और आजम खां की नाराजगी के चर्चों के बीच अल्पसंख्यकों को 85 सरकारी योजनाओं में 20 फीसदी हिस्सेदारी देकर सपा ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं।
पहला, इस फैसले से सपा ने सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करने के सवाल पर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।
वहीं जाने-अनजाने यह भी संकेत दे दिए कि आजम खां के बिना भी मुस्लिम मामलों पर सरकार फैसले लेती रहेगी। लोकसभा चुनाव करीब है। मोदी का हौव्वा सबको खौफजदा कर रहा है।
इसलिए सभी राजनीतिक दल जातीय गोलबंदी और मजबूत करने की कोशिश में हैं। सपा को आशंका है कि कहीं मोदी विरोध के नाम पर मुसलमान कांग्रेस के साथ चला गया तो उसकी लुटिया ही डूब जाएगी।
इसलिए सच्चर कमेटी की सिफारिशों की रोशनी में सरकारी योजनाओं में मुसलमानों को प्रदेश में उनकी आबादी (19.33 फीसदी) से थोड़ी अधिक हिस्सेदारी देकर सपा सरकार ने मुसलमानों को यही संकेत देने की कोशिश की है, उनकी असल हितैषी वही है।
मुस्लिम राजनीति के जानकारों का कहना है कि जवाब में केंद्र सरकार को सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करना आसान और व्यवहारिक नहीं होगा। अगर आधी-अधूरी सिफारिशें लागू करने का फैसला किया गया तो सपा के लिए कहना आसान होगा कि उसके दबाव में केंद्र सरकार ने ऐसा किया।
श्रम राज्य मंत्री शाहिद मंजूर कहते भी हैं, सपा ने घोषणापत्र में जो वादा किया था, उसको पूरा करने की यह एक साहसिक व महत्वपूर्ण कोशिश है। कांग्रेस की तरह आश्वासनों का लालीपॉप देना हम समाजवादियों की फितरत में शामिल नहीं है।
सपा के ही एक मुस्लिम विधायक का कहना है कि जिन योजनाओं में हिस्सेदारी दी जानी है, उनको सही तरीके अमलीजामा पहना दिया गया तो खासतौर से ग्रामीण क्षेत्र के मुसलमानों में सरकार और पार्टी का संदेश जल्द और आसान तरीके से पहुंच जाएगा।
सरकार ने अपने फैसले के साथ यह भी घोषणा की है कि दिए जाने वाले लाभों को प्रचारित करने के लिए कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से प्रचार किया जाएगा। साथ ही स्कूल, अस्पताल, तहसील, बस अड्डों व रेलवे स्टेशन पर आकर्षक पोस्टरों व हैंडबिल के माध्यम से प्रचार किया जाएगा।
पहले दिन से कहा यह जा रहा कि योजना का प्रचार-प्रसार इस तरह हो सकता है कि वह चुनावी रंग में खप जाए और आयोग के शिंकजे से भी बाहर रहे।
आजम को सबक
किन्हीं कारणों से नाराजगी के चलते आजम खां पिछली 5-6 कैबिनेट मीटिंग में नहीं आ रहे हैं। कैबिनेट मीटिंग में उनकी गैरहाजिरी में मुसलमानों के बारे में बड़ा फैसला होने को लेकर पार्टी व पार्टी के बाहर तक चर्चा का विषय रहा।
फैसले ने संकेत दिया है कि आजम की वजह से मुस्लिम मामलों पर फैसले मुल्तवी नहीं रहेंगे। चर्चा तो यहां तक रही कि नेतृत्व नहीं चाहता कि आजम अकेले पार्टी में मुस्लिम आवाज बनें।