उत्तर प्रदेश में उद्योगों की स्थापना के लिए भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए राज्य सरकार अब उजड़े वन क्षेत्रों और गैर वन राजस्व भूमि का लैंड बैंक तैयार कर रही है। इसके लिए वन एवं राजस्व विभाग की संयुक्त उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया है। बड़े भूभाग का डिजिटल मानचित्रण (डिजिटाइजेशन) किया जा चुका है।
आधिकारिक कार्ययोजना के अनुसार प्रदेश में उद्योगों, अवसंरचना परियोजनाओं और अन्य विकास कार्यों के लिए उपयुक्त भूमि की पहचान कर उसे परिवेश पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा। इससे निवेशकों को पहले से उपलब्ध भूमि की जानकारी मिलेगी। वहीं, परियोजनाओं के लिए भूमि चयन व पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और समयबद्ध हो सकेगी।
डीरेगुलेशन-2.0 के तहत इस काम के लिए तीन चरण निर्धारित किए गए हैं। पहले चरण में वन एवं राजस्व विभाग की संयुक्त समिति ने उजड़े वन क्षेत्र और गैर वन राजस्व भूमि की पहचान शुरू की। दूसरे चरण में उपयुक्त भूमि का डिजिटलीकरण और लैंड बैंक तैयार किया जा रहा है। तीसरे चरण में सत्यापित भूमि का विवरण परिवेश पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा, जिससे निवेशकों और संबंधित विभागों को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म उपलब्ध हो सके।
वर्तमान स्थिति के अनुसार राजस्व विभाग ने भूमि का डाटा साझा कर दिया है। हालांकि वन विभाग द्वारा इस डाटा का सत्यापन अभी पूरा किया जाना बाकी है। इनपुट के लिए इन्वेस्ट यूपी और वन विभाग की ओर से कई बैठकें, पत्राचार हो चुका है।
डीरेगुलेशन-2.0 के तहत केवल लैंड बैंक ही नहीं, बल्कि राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण और राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति की बैठकों की संख्या भी बढ़ाई जा रही है। इसका कैलेंडर पहले जारी होगा और एजेंडा पहले से साझा किया जाएगा। भौतिक व ऑनलाइन दोनों माध्यमों से बैठकें होंगी। इससे पर्यावरणीय स्वीकृतियों में लगने वाला समय कम होगा।
औद्योगिक विकास विभाग के मुताबिक प्रदेश में पहले से उपलब्ध और सत्यापित भूमि का डिजिटल लैंड बैंक तैयार होने से निवेशकों को अलग-अलग विभागों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। परियोजनाओं के लिए उपयुक्त भूमि का चयन तेज होगा, पर्यावरणीय मंजूरियों में देरी कम होगी और निवेश प्रस्तावों के क्रियान्वयन की गति बढ़ेगी। सरकार का लक्ष्य उत्तर प्रदेश को निवेश के लिए और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना और एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को गति देना है।