टंडन 1996 से 2009 तक लगातार तीन बार विधायक का चुनाव जीते। 1997 में वह नगर विकास मंत्री रहे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से दूर होने के बाद साल 2009 में भाजपा ने लखनऊ लोकसभा सीट टंडन को ही सौंपी थी। उन्होंने यहां से चुनाव भी लड़ा।
पहले 1978 से 1984 तक और फिर 1990 से 96 तक लालजी टंडन दो बार यूपी विधानपरिषद के सदस्य रहे। 1991 में वह यूपी के मंत्री पद पर भी रहे।
यूपी की राजनीति में टंडन ने किए कई प्रयोग
लालजी टंडन को उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग अलग किस्म के प्रयोगों के लिए जाना जाता है। 90 के दशक में उत्तर प्रदेश में बनी भाजपा और बसपा की सरकार के पीछे के गठजोड़ में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है।
बताया जाता है कि बसपा प्रमुख मायावती लालजी टंडन को राखी बांधती थीं और टंडन ने ही उन्हें भाजपा का साथ देने के लिए मनाया था। दोनों के बीच भाई-बहन के संबंध थे, इसीलिए मायावती ने लालजी टंडन की बात मानकर भाजपा से गठबंधन किया था।
टंडन ने लखनऊ पर लिखी थी विवादित पुस्तक 'अनकहा लखनऊ'
लालजी टंडन ने अपनी पुस्तक 'अनकहा लखनऊ' में लखनऊ के बारे में ऐसी कई चीजें लिखीं हैं जिसे लेकर वो विवादों में फंसे रहे। इस पुस्तक में टंडन ने लखनऊ की संस्कृति पर लिखा था कि इसे जबरन 'नवाबी तहजीब का शहर' बनाने की कोशिशें की गईं।
उन्होंने लक्ष्मण टीले का उल्लेख करते हुए लिखा था कि लखनऊ में पहले एक गुफा थी, जिसपर मुस्लिम शासकों ने मस्जिद बनवा दी। इस तरह के तमाम तथ्यों से उनकी पुस्तक पर विवाद खड़े हुए थे।
टंडन बाद में भले ही बिहार और मध्यप्रदेश के राज्यपाल रहे, लेकिन लखनऊ से उनका नाता कभी कमजोर नहीं हुआ। उन्होंने भाजपा सरकार में अन्य राज्यों में अपनी भूमिका निभाई, लेकिन अंतिम समय में एक बार फिर अपने जन्मस्थान लौट आए। लखनऊ में ही सुबह 5:35 बजे टंडन ने आखिरी सांस ली।