ऑपरेशन थिएटर में लेटे हुए मरीज के सिर की सर्जरी हो और वो बातचीत भी करता रहे, ये संभव बनाया है न्यूरो एनेस्थीसिया केविशेषज्ञों ने। चिकित्सीय भाषा में इसे ‘अवेक सर्जरी’ कहते हैं।
इसमें सर्जरी के दौरान मरीज से बातचीत कर मस्तिष्क की कार्यक्षमता का आंकलन किया जाता है। जिससे मस्तिष्क के जिस हिस्से की सर्जरी हो रही हो उसके अलावा अन्य हिस्से को नुकसान नहीं पहुंचे।
द इंडियन सोसाइटी ऑफ न्यूरो एनेस्थीसिया एंड क्रिटिकल केयर (इसनैक) की 16वीं राष्ट्रीय संगोष्ठी में शनिवार को ये जानकारी आयोजन सचिव डॉ. शशि श्रीवास्तव ने दी।
संजय गांधी पीजीआई में आयोजित संगोष्ठी में डॉ. शशि श्रीवास्तव ने बताया कि मस्तिष्क से ही सभी अंगों का संचालन होता है। मस्तिष्क को अधिकतम नुकसान होने पर ही मरीज को लकवा मार जाता है। आंशिक में हाथ या पैर का काम न करना, देखने या बोलने की क्षमता खत्म हो जाना, चेहरे पर लकवा मार जाना जैसी दिक्कतें होती हैं।
सुन और बोल सकता है मरीज
मस्तिष्क की सर्जरी के दौरान मरीज को इस तरह एनेस्थीसिया दी जाती है कि वो सबकुछ सुनता और बोलता रहे। ये कार्य न्यूरो एनेस्थेटिस्ट करते हैं। जिससे सर्जन को ये पता लगता रहे कि उसकी सर्जरी सही हो रही है और मस्तिष्क के किसी भी ठीक हिस्से को नुकसान न हो रहा हो।
डॉ. शशि ने बताया कि जैसे ही सर्जरी के दौरान किसी सही हिस्से को नुकसान पहुंचता है तो मरीज की प्रतिक्रिया बंद हो जाती है। इससे न्यूरो एनेस्थेटिस्ट तुरंत न्यूरो सर्जन को बताता है कि कहीं कुछ गड़बड़ी हो रही है।
इससे न्यूरो सर्जन सचेत हो जाता है। कई तरह के ट्यूमर की सर्जरी भी मरीज से बातचीत करते हुए की जाती है।
तेज दर्द व बेहोशी है खतरे के लक्षण
एसजीपीजीआई के डॉ. देवेंद्र गुप्ता ने बताया कि सिर में अचानक तेज दर्द, उसके बाद बेहोशी या फिर लकवा मार जाना मस्तिष्क में किसी गंभीर स्थिति के लक्षण हैं। ऐसे में मरीज को तुरंत न्यूरो सर्जरी विशेषज्ञों वाले अच्छे चिकित्सा संस्थान ले जाना चाहिए।
क्योंकि मरीज के मस्तिष्क की स्थिति को जानने के लिए सीटी स्कैन, एमआरआई की सुविधा को साथ ही न्यूरो सर्जन व न्यूरो एनेस्थेटिस्ट होना जरूरी है। डॉ. देवेंद्र ने बताया कि अधिकतर मरीज दिमाग में खून की नस फट जाने या फिर एन्युरिज्म होने जाने के कारण बेहोश स्थिति में आते हैं।
सीटी व एमआरआई जांच के बाद न्यूरो सर्जन मरीज के ऑपरेशन या फिर न्यूरो एनेस्थेटिस्ट की मदद से मरीज को राहत पहुंचायी जाती है। उन्होंने बताया कि यदि मरीज को एन्युरिज्म (खून की नस का गुब्बारे की तरह फूलना) होता है तो नस में क्लिप डालकर एन्युरिज्म में खून जाने का रास्ता बंदकर दिया जाता है।
इससे एन्युरिज्म के फटने का खतरा कम हो जाता है। क्योंकि एन्युरिज्म फटने से पूरे मस्तिष्क को नुकसान पहुंचता है। यदि मरीज के मस्तिष्क में एन्यूरिज्म फट जाता है तो उसके सर्जरी की जरूरत पड़ती है। डॉ. देवेंद्र ने बताया कि शनिवार को यूके से आए डॉ. अरुण कुमार गुप्ता ने डॉ. मालथी ओरेश दिया। इस मौके पर एनेस्थीसिया विभाग के हेड प्रो.पीके सिंह, इमरजेंसी मेडिसिन विभाग केहेड व पेन मैनेजमेंट यूनिट के प्रभारी प्रो.एसपी अंबेश भी मौजूद थे।
मरीज को कई दिन तक रख सकते हैं बेहोश
डॉ. शशि ने बताया कि सिर की गंभीर चोट के मरीजों को कई दिन तक भी एनेस्थीसिया देकर बेहोश रखा जाता है। ऑपरेशन थिएटर से निकलने के बाद मरीज को आईसीयू या पोस्ट ऑपरेटिव वार्ड में लगातार बेहोश रखा जाता है। क्योंकि उसके हिलने-डुलने से मस्तिष्क को नुकसान पहुंच सकता है।
उसकी स्थिति में सुधार के बाद ही उसे धीरे-धीरे होश में लाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में भी न्यूरो एनेस्थीसिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। मरीज को सर्जरी के बाद होने वाले दर्द के अनुभव से बचाने के लिए भी एनेस्थेटिस्ट ही पेन मैनेजमेंट करता है।
सिंगापुर से आयी न्यूरो एनेस्थेटिस्ट डॉ. जून ने रोल ऑफ हाइपोथर्मिया विषय पर बताया कि सिर की चोट के गंभीर मरीजों में सर्जरी के दौरान मस्तिष्क को अधिक नुकसान न पहुंचे, इसलिए उसे ठंडा भी किया जाता है।
इसे ‘हाइपोथर्मिया’ कहते हैं। मरीज के पूरे शरीर को ठंडाकर या फिर सिर्फ खून को ठंडाकर ब्रेन को सुरक्षित किया जाता है। ठंडा होने से मस्तिष्क ऑक्सीजन का कम इस्तेमाल करता है। इससे उसकी क्रियाएं धीमी हो जाती हैं और मस्तिष्क सुरक्षित हो जाता है।