1964 से हजरतगंज में शुक्ला चाट के नाम से एक दुकान है। जहां पर आपको चाट के साथ-साथ सोहन पापड़ी, बताशे, दही बड़ा, टिक्की मटर का स्वाद मिल जाएगा। दूसरी पीढ़ी के रूप में मौजूद दिनेश शंकर शुक्ला ने बताया कि यह चाट यूं ही खास नहीं बनती।
इसमें हमारे परिवार की मेहनत और मसालों की शुद्धता घुली हुई रहती है। उन्होंने बताया कि खड़े हुए मसालों को खरीद कर उन्हें पीसना व कई अन्य मसालों को इनमें शामिल कर मिश्रण तैयार करना रोज का काम है।
अभी दुकान पर 7 से 8 लोग परिवार के ही हैं बाकी के अन्य चार से पांच कर्मचारी बाहर के हैं। दिन के 2:00 बजे से लेकर रात के 10:00 बजे तक यहां पर आपको जबरदस्त भीड़ देखने को मिल जाएगी। हमारे पास विदेशों से भी आर्डर आते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे पास आइटम में सोहन पापड़ी, मटर, पानी के बताशे, दही बड़ा, टिक्की है।
दुकान पर मौजूद मनोज साहू ने बताया कि लखनऊ से शुक्ला चाट का रिश्ता जैसे चोली और दामन का रिश्ता है। हम जब भी इस रास्ते से गुजरते हैं तब शुक्ला जी की चाट तो खाते ही हैं साथ में परिवार के लिए पैक भी कराते हैं। इनकी चाट में सबसे विशेष चीज इनके मसाले हैं। मैं लखनऊ आने वाले सैलानियों के लिए यह जरूर कहना चाहूंगा कि वह हजरतगंज की शुक्ला चाट जरूर खाएं।
मालिक गोपाल शर्मा ने बताया कि हमारी चाय में कुछ भी ऐसा नहीं है जो दूसरी जगह की चाय में न हो पर हमारा तरीका इसे स्पेशल बना देता है। शर्मा जी की चाय में चाय की पत्ती व दूध को अलग अलग खौलाया जाता है। सुबह होते ही आग पर दूध व चाय को चढ़ा दिया जाता है। हमारी चाय में इलायची को शामिल किया जाता है। जो चाय के साथ खौलती रहती है। चाय व दूध को कड़क हो जाने के बाद सिर्फ उसे परोसना रह जाता है। कप में हम अलग अलग पकी हुई चीजों को मिलाते हैं और बन जाती है शर्मा की चाय।
पूर्वजों का संघर्ष: दुकान पर मौजूद तीसरी पीढ़ी के मानव शर्मा ने बताया कि दादा स्व ओम प्रकाश शर्मा 1949 में अलीगढ़ से लखनऊ आए थे। दादा ने हलवाई की नौकरी की। कुछ दिन टोकरी में मटर बेचा और किराए की दुकान खरीदी और चाय के साथ समोसा बनाना शुरू कर दिया। लोगों के प्यार व कारीगरों की मेहनत ने शर्मा की चाय को लखनऊ की पहचान बना दिया।
उन्होंने कहा कि यहां वही भैंस का दूध है जो आम जगहों पर है लेकिन हमारे यहां दूध को घंटों पकाकर प्यार का तड़का लगाया जाता है। यहां पर बंद मक्खन पीला न होकर सफेद होता है। गोल समोसे पर उन्होंने बताया कि बाजार में कर्मचारी उनके समोसे को अपना बता कर ज्यादा मूल्य बताने लगे थे जिससे उन्होंने अपने समोसे की अलग पहचान बनाई और समोसा ही गोल कर दिया।
आमजनता की बातचीत बहराइच जिले की प्रियंका मिश्रा ने बताया कि उनका परिवार लखनऊ आए और चाय न पिए ऐसा नहीं हो सकता। मैं और मेरा परिवार चाय का शौकीन नहीं बल्कि शर्मा जी की चाय का शौकीन है। पूरा लखनऊ घूमने के बाद हम लोग यहां चाय पीकर तरोताजा महसूस करते हैं। दिल्ली से आए राजेश झा ने बताया कि यहां की चाय की गुणवत्ता यहां के दूध से है जो घंटों खौलाया जाता है। मैंने लखनऊ के लगभग हर चौराहे की चाय पी होगी लेकिन इनकी चाय जैसा स्वाद कही नहीं मिला।
उदय गंज के पुराने हनुमान मंदिर के पास रमेश पूरी वाले की दुकान है। यह दुकान 1955 में स्थापित की गई थी। यहां आप स्वादिष्ट मुलायम पूरी के साथ छोले का लुत्फ उठा सकते हैं। रमेश ने बताया कि यह पूरी और छोला लोगों को इसलिए भाता है क्योंकि यह शुद्धता के साथ शुद्ध मोटे गेहूं से बनती है। दुकान को स्थापित करने के कुछ साल बाद भीड़ इतनी ज्यादा होने लगी कि कारीगरों के सहारे डिमांड पूरी करना संभव नहीं था इसलिए अब मशीनों का प्रयोग होने लगा है।
मौजूदा समय में एक बार में हम एक कुंटल आटा गूथते हैं और विशेष तरीका अपनाते हैं। जिससे आटा मुलायम रहता है और पूरी स्वादिष्ट बनती है। इसी तरह छोले में हम अपने बनाए हुए विशेष मसालों का प्रयोग करके छोले को बाकी जगहों से अलग बनाते हैं। यही वजह है कि लोगों को हमारे यहां का पूरी और छोला अन्य जगहों से ज्यादा भाता है।
उन्होंने कहा कि माता-पिता के आशीर्वाद और जनता के प्यार ने हमें यहां तक पहुंचा दिया कि सुबह 8:00 बजे से रात के 10:00 बजे तक हमारी दुकान की कढ़ाई उतरती ही नहीं है। लगातार कुंतलों की संख्या में पूरियां निकलती रहती हैं।
दुकान पर मौजूद एक ग्राहक राजेश कुमार ने बताया कि कभी यहां की पूरी एक आना की हुआ करती थी और अब 25 रुपये की दो पूरी हैं। इसका स्वाद ऐसा है कि एक बार अगर आपने खा ली तो फिर आप बार-बार यहां आएंगे।