केजीएमयू में बृहस्पतिवार से डेथ ऑडिट शुरू हो गया। अभी तक एशिया के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान में इलाज के दौरान मरने वाले मरीजों की मौत का राज कागजों में दफन हो रहा था।
क्वीन मेरी अस्पताल में लगातार हो रही मौतों के कारणों को चिकित्सा संस्थान छिपाने का प्रयास करता था। अमर उजाला ने जब डेथ ऑडिट न होन की खबर छापी तब डेथ ऑडिट कमेटी बनाने की कार्रवाई शुरू हुई। आखिरकार बृहस्पतिवार को कमेटी की पहली बैठक का आयोजन किया गया।
केजीएमयू में बृहस्पतिवार को हुई बैठक मॉरटेलिटी कमेटी (डेथ ऑडिट) में सीएमएस प्रो. एससी तिवारी की अध्यक्षता में चिकित्सा अधीक्षक प्रो. विजय कुमार, उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वेद प्रकाश, सर्जरी विभाग के डॉ. एचएस पाहवा, मेडिसिन विभाग के डॉ. कौसर उस्मान, पैथोलॉजी विभाग के डॉ. अशुतोष और फोरेंसिक साइंस विभाग के डॉ. अनूप वर्मा शामिल हुए। कमेटी ने डेथ ऑडिट से संबंधित गाइड लाइन पर चर्चा की।
इसलिए जरूरी डेथ ऑडिट
इस दौरान संस्थान में बीते दिनों ही तीन मौतों से जुड़े केस भी देखे। इन केस में इलाज, जांच और मौत के बारे में कंसलटेंट से पूरी जानकारी मांगी गई।
गौरतलब है कि डेथ ऑडिट किसी भी अस्पताल की कार्यप्रणाली का जरूरी हिस्सा है। इससे अस्पतालों में उपलब्ध चिकित्सा, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, डॉक्टरों, नर्सों व कर्मचारियों की कार्यक्षमता का आंकलन किया जाता है।
मरीजों की मौत के पीछे के कारणों और खराब व्यवस्था का इस दौरान पता चलता है। एक विशेषज्ञ चिकित्सक कहते हैं कि किसी आर्थिक क्षति को तो पूरा किया जा सकता है लेकिन किसी की जिंदगी को वापस दे पाना संभव नहीं है।
इसलिए इलाज में किसी भी तरह की लापरवाही को बढ़ावा देना चिकित्सा क्षेत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। डेथ ऑडिट में अस्पताल में भर्ती के समय मरीज की स्थिति, इलाज के लिए क्या सलाह दी गई, मरीज के अस्पताल में भर्ती रहने का समय, उस दौरान इलाज और मौत का कारण का आंकलन भी इस दौरान होता है।
खामियों को दूर करने में सहायक
इससे पता चलता है कि संस्थान में इलाज के संसाधन अपर्याप्प्त तो नहीं है। उसके इलाज में जरूरी नर्स, वार्ड ब्वॉय, जांच के उपकरणों, बीमारी के इलाज केलिए योग्य चिकित्सक कमी का भी इस ऑडिट में पता चल जाता है।
मेडिकल ऑडिट एंड डेथ ऑडिट पर विषय पर 2010 में जनरल ऑफ इंडियन एकेडमी ऑफ फोरेंसिक मेडिसिन में एक पेपर भी प्रकाशित किया गया था।
इस पेपर के लेखकों में शामिल बीएचयूआईएमएस के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. एस.के. पांडेय बताते हैं कि सरकारी अस्पतालो में मरीज के मौत के कारणों की पुनर्मूल्यांकन की व्यवस्था नहीं है।
यदि डेथ का ऑडिट होने लगे तो अस्पताल और इलाज की खामियों को दूर किया जा सकता है। पुनर्मूल्यांकन से अपनी कमियों का पता चलता है।
आंध्र प्रदेश सरकार ने सभी अस्पतालों में डेथ ऑडिट को अनिवार्य कर दिया है। इसके अलावा कारपोरेट अस्पतालों में भी ये व्यवस्था लागू कर दी गई है। बृहस्पतिवार से केजीएमयू में ये व्यवस्था शुरू हो गई।