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काकोरी कांड: वो डकैती नहीं, विद्रोह का वार था

Fri, 09 Aug 2013 11:34 AM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
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वह पौने पांच हजार रुपए की डकैती अंग्रेजी सत्ता, जिसका सूर्य कभी नहीं अस्त होता था, उसके सीने में एक नश्तर की तरह चुभी थी।
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काकोरी में शहीद स्मारक पर उकेरी गई इबारतें खामोशी से आज भी वह कहानी कहती हैं। 9 अगस्त 1925 की वह शाम जब आसमान पर धुंधलका छा रहा था तो काकोरी से आलमनगर के बीच अचानक 8 डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर चेन पुलिंग की वजह से रुकी।

इसके बाद रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की गर्जना थी और गोलियां की तड़तड़ाहट। कोई नीचे नहीं उतरेगा, हमारी नीयत किसी यात्री को लूटने या फिर किसी हत्या करने की नहीं है।
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हम केवल सरकारी खजाना लूटने के लिए यहां आए हैं। सभी लोग ट्रेन के अंदर ही रहेंगे। थोड़ी ही देर में रेलवे का खजाना लेकर जा रही यह ट्रेन लूट ली गई।

इसके बाद यह केस चला और क्रांतिकारियों को सजा भी हुई। मगर काकोरी का नाम इस दिन के बाद इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया।

यूं शुरू हुआ था इस क्रांति का सफर
1920 के लगभग हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन क्रांतिकारियों का एक भूमिगत संगठन गठित किया गया था। एसोसिएशन से जुड़े क्रांतिकारियों ने काकोरी कांड से पहले पीलीभीत और प्रतापगढ़ के गांवों में कई एक्शन किए थे।

वे महाजनों और जमींदारों को लूटा करते थे। मगर इन एक्शन का ब्रितानिया हुकूमत पर कोई भी असर नहीं पड़ा। तो एसोसिएशन ने कुछ बड़ा करने के लिए सोचा।

रामप्रसाद बिस्मिल ने काकोरी में ट्रेन डकैती करने का यह प्लान बनाया। जिसमें उनके साथ शामिल हुए चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां और राजेंद्र नाथ लाहिणी।

शुरुआत में अशफाक उल्लाह खां को लगता था कि वे लोग यह काम नहीं कर पाएंगे। मगर जब सभी राजी हो गए तो उन्होंने भी साथ देने का फैसला किया।

8 डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर विभिन्न रेलवे स्टेशनों के दिन भर का रेवेन्यू लेकर लखनऊ में रेलवे के मुख्य खजाने में धन जमा कराने के लिए चलती थी।

इसमें खजाना गार्ड की बोगी में रखा जाता था। रामप्रसाद बिस्मिल पहले ही रेकी कर चुके थे। पहले यह एक्शन आठ अगस्त को होना था। मगर थोड़ी देरी हो जाने से ट्रेन छूट गई।

दूसरे दिन डकैती को अंजाम दिया गया। शाम को यह ट्रेन काकोरी से चली तो क्रांतिकारी इसमें चढ़ गए। काकोरी से आलमनगर के बीच सेकेंड क्लास में बैठे क्रांतिकारियों ने चेन पुलिंग की।

जिसके बाद थर्ड क्लास में बैठे क्रांतिकारी भी उतर आए। फिर यह डकैती हुई। इस घटना के पूर्व के एक्शनों में साथ रहे राजधानी के दिवंगत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामकृष्ण खत्री को भी डकैती में नामजद किया गया था।

उनके पुत्र उदय खत्री बताते हैं कि, पार्टी से जुड़ने के बाद उनका मुख्य काम धन जुटाने का था। इसलिए काकोरी कांड से पहले गांवों में अंग्रेजों के पिट़्ठू महाजनों से लूट कर देशभक्तों के अभियान पर खर्च करते हैं।

जब काकोरी कांड हुआ तब इन सारी घटनाओं और काकोरी ट्रेन डकैती को मिला कर एक केस बनाया गया। जिसमें पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिणी आदि के साथ पिता जी को भी आरोपी बनाया गया।

उनको इस केस में 10 साल की सजा सुनाई गई। वे बताते हैं कि, इस डकैती में क्रांतिकारियों ने करीब पौने पांच हजार रुपए लूटे थे। जो कि उस समय एक बहुत बड़ी रकम होती थी।अंग्रेजी शासन इस घटना से हिल गया था। तभी से काकोरी का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

2006 में आमिर खान ने बनाई फिल्म
काकोरी कांड से प्रेरित होकर 2006 में आमिर खान ने सुपरहिट फिल्म रंग दे बसंती बनाई। इस फिल्म में दिखाया गया कि किस तरह से कुछ युवा काकोरी कांड से प्रेरित होकर सफेदपोश नेताओं और रक्षा दलालों का काम तमाम करते हैं। इसके साथ ही जनता तक अपनी आवाज को पहुंचाते हैं।

आज सादगी से मनाएंगे काकोरी शहीद दिवस
शहीद स्मारक समारोह समिति के बैनर तले उदय खत्री नौ अगस्त को सादगीपूर्ण तरीके से काकोरी शहीद दिवस का आयोजन करेंगे। जबकि 12 अगस्त को इसे भव्यता के साथ मनाया जाएगा।
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 उदय खत्री ने बताया कि, ईद की वजह से स्कूली बच्चों को जुटा पाना संभव नहीं होगा। इसलिए नौ को सुबह 8:30 बजे जीपीओ में माल्यार्पण करेंगे।

9:30 बजे शहीद स्मृति पार्क बसंत कुंज में माल्यार्पण होगा। इसके बाद 10:30 बजे काकोरी शहीद स्मारक में काकोरी में हम माल्यार्पण करेंगे। इसके बाद 12 अगस्त को सुबह 9:30 बजे से काकोरी शहीद स्मारक पार्क में कई आयोजन किए जाएंगे।
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