यूपी के झांसी में केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) के असिस्टेंट कमिश्नर और दो अन्य अधिकारियों पर करोड़ों रुपये की रिश्वत के आरोपों का सीबीआई द्वारा भंडाफोड़ करने के बाद विभाग में लंबे समय से पनप रहे कथित भ्रष्टाचार की परतें खुलने लगी हैं। हालांकि, मामले की जांच अभी जारी है। सीबीआई की कार्रवाई से साफ है कि यह जांच सिर्फ कुछ नामों तक सीमित नहीं रहने वाली। सूत्रों का कहना है कि जैसे-जैसे परतें खुलेंगी वैसे-वैसे केंद्रीय जीएसटी के भीतर चल रहे कथित सेटलमेंट नेटवर्क की असली तस्वीर सामने आएगी।
केंद्रीय जीएसटी में मुखबिरों की एक समानांतर व्यवस्था लंबे समय से सक्रिय है जहां कर चोरी और सेटलमेंट की सूचनाएं दी जाती हैं। नियमों के मुताबिक सही सूचना देने पर मुखबिरों को सीक्रेट फंड से इनाम देने का प्रावधान है लेकिन सूत्र बताते हैं कि यह राशि बेहद कम होती है। यही वजह है कि कई मुखबिर आधिकारिक इनाम की जगह सेटलमेंट के रास्ते को तरजीह देते हैं। इसमें विभागीय अफसरों और मुखबिर दोनों की मोटी कमाई होती है। झांसी मामले में भी सूत्रों का दावा है कि करोड़ों रुपये की कथित डील हुई लेकिन मुखबिर को उसका अपेक्षित हिस्सा नहीं मिला। इसी असंतोष के चलते मुखबिर ने यूटर्न लिया और पूरी जानकारी बाहर आ गई।
इस पूरे घटनाक्रम में विभाग के दो ऐसे अधिकारियों की भूमिका सामने आ रही है जिन्हें शुरुआत में इस कथित सेटलमेंट का हिस्सा बनाया गया था लेकिन बाद में बाहर कर दिया गया। बड़ी डील से बाहर होने की नाराजगी ने पूरे सिंडिकेट की गोपनीयता तोड़ दी और मामला सीधे सीबीआई तक पहुंच गया। झांसी रिश्वत कांड केंद्रीय जीएसटी में पहला मामला नहीं है।