‘सप्ताह में दो बार बेटे की डायलिसिस होती है। मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं। गरीबी रेखा के नीचे होने से केजीएमयू में मुफ्त में डायलिसिस हो जाती थी, लेकिन दो माह से बाहर से करानी पड़ रही है। तीन माह से यहां टरकाया जा रहा है। वहीं, प्राइवेट अस्पताल वाले तीन से चार हजार ले रहे हैं। अभी तक गहने बेच कर डायलिसिस कराता रहा, लेकिन अब बेटे को बचाने के लिए खेत बेचना पड़ेगा।’ यह दर्द झलका सांडी से आए शिवपूजन का। वह शताब्दी अस्पताल में पता करने आए थे कि मशीनें कब तक ठीक होंगी। यही स्थिति दूसरे मरीजों की भी हैं।
शताब्दी अस्पताल में डायलिसिस को बने कैश काउंटर से लेकर यूनिट तक आमतौर पर भीड़ रहती है। लेकिन, मंगलवार को अवकाश की वजह से नजारा बदला था। करीब दो दर्जन लोग यहां थे। इसमें ज्यादातर वे थे, जो विपन्न या बीपीएल श्रेणी में डायलिसिस कराते रहे हैं। कुछ ऐसे भी थे, जो शुल्क जमा कर डायलिसिस कराते हैं। कई ऐसे भी मिले, जो दो दिन से अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन जब सुबह पता चला कि तीन मशीनें और बंद हो गई हैं और अब सिर्फ तीन मशीन पर डायलिसिस होगी तो उनकी उम्मीदें टूट गईं। कैश काउंटर पर लोग पैसा जमा करने की जिद कर रहे थे। मौजूद कर्मचारी समझाता है कि सिर्फ तीन मशीनें हैं, जिसका बहुत जरूरी होगा, उसी का होगा। जरूरी की परिभाषा पूछने पर वह बगले झांकने लगा। लिफ्ट से आगे बढ़ने पर जमीन पर लेटे मरीज मिले।
डायलिसिस यूनिट के बाहर तैनात सुरक्षा गार्ड सभी को रोके रखा था। डायलिसिस हो रही है या नहीं, यह सुनते ही सबके कान खड़े हो जाते हैं। कोई भाई के शरीर में सूजन आ जाने की बात बताता तो कोई बेटे की कराह का हवाला देकर मदद मांगता। मीडिया से होने की जानकारी देने पर फिर सबकी आंखों की चमक गायब हो जाती है। यह भी कहते हैं कि आप लोग ही कुछ करिये। डायलिसिस यूनिट के कर्मचारी खुद को असहाय बताते हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक कर्मचारी ने कहा, बेहद गंभीर मरीजों की ही डायलिसिस कर रहे हैं। वक्त पर डायलिसिस होती रहने से मरीज की उम्र पांच से 10 साल बढ़ जाती है।