खुद के परिसर में काम करवाने का बहाना बना कर जेसीबी मशीन खरीदना और फिर उसे चोरी से किराए पर चलवाने का खेल पकड़ में आया है।
इस पूरे खेल में एक ओर बड़े पैमाने पर वाणिज्य कर की चोरी हो रही है तो दूसरी ओर परिवहन विभाग भी अंधेरे में है।
दोनों विभागों को राजस्व का चूना लग रहा है। सच सामने आने के बाद वाणिज्य कर विभाग ने जांच शुरू कर दी है।
दोनों महकमों को राजस्व की चोट दे रहे जेसीबी मालिकों को अब उसकी भरपाई करनी होगी।
वाणिज्य कर विभाग के अधिकारियों के अनुसार 150 से अधिक संचालकों ने पंजाब के बल्लभगढ़ और राजस्थान के अलवर से जेसीबी की खरीद की है।
इसके लिए वाणिज्य कर महकमे से फार्म-38 (दूसरे राज्य से माल लाने का अनुमति प्रपत्र) लिया गया।
जिस पर जेसीबी को खुद यानी निजी कार्य के लिए खरीदना दर्शाया गया है। 90 फीसदी जेसीबी के खरीददारों का ब्योरा दर्शाया गया है।
यानी जेसीबी की खरीद का विवरण मीराबाई मार्ग स्थित एडिशनल कमिश्नर लखनऊ रेंज के सेक्टर 20 एवं 21 में है।
इनकी कीमत 15 से 40 लाख रुपए तक है। इस प्रकरण की स्पेशल इंवेस्टीगेशन ब्रांच (एसआईबी) से जांच कराई जा रही है।
जांच में जेसीबी के खरीददारों की सूची तैयार हो चुकी है। जांच के दूसरे चरण में जेसीबी मालिक के पते पर सत्यापन शुरू होगा।
एडिशनल कमिश्नर स्तर के अधिकारी ने बताया कि गोपनीय शिकायत मिली है कि जिन लोगों ने जेसीबी को खुद के कार्य के लिए खरीदने का दावा किया था, वह गलत है।
ऐसे लोग जेसीबी को किराए पर देकर मोटी आमदनी कर रहे लेकिन जेसीबी की खरीद पर वाणिज्य कर नहीं चुकाया।
वहीं वाणिज्य कर महकमे के फॉर्म- 38 पर खरीददारों ने सही उल्लेख भी नहीं किया है। उधर, जेसीबी मशीन को लेकर परिवहन विभाग भी अंधेरे में है।
विभाग ने जेसीबी को रजिस्ट्रेशन के दायरे से बाहर रखा है। उनका मानना कि इसके खरीददार खुद के निर्माण स्थल पर जेसीबी का संचालन करते हैं।
असलियत यह कि इन जेसीबी को घंटे के आधार पर किराए पर संचालन हो रहा है। यानी कॉमर्शियल इस्तेमाल होने पर भी परिवहन टैक्स की नहीं मिलता है।