वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि सपा व बसपा को डर है कि लोकसभा में भाजपा यदि 2019 में भी 2014 का प्रदर्शन दोहरा देती है तो समर्थकों के दिल और दिमाग से उनका प्रभाव ही खत्म हो जाएगा। इससे 2022 की चुनौती और बढ़ जाएगी। इसलिए दोनों किसी न किसी तरीके से भाजपा को रोकना चाहते हैं। हालांकि 1993 के आंकड़ों की कसौटी पर कसें तो सपा-बसपा को विधानसभा में कुल 176 जबकि भाजपा को 177 सीटें मिलीं यानि लगभग बराबर।
लोगों का तर्क है कि तब कल्याण सिंह सरकार के बर्खास्त होने से सहानुभूति की लहर भाजपा के साथ थी। इस बार भाजपा केंद्र व प्रदेश में सत्ता में है इसलिए उसे सत्ताविरोधी लहर का भी सामना करना पड़ेगा।
राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी एक और परिस्थिति की तरफ भी ध्यान दिलाते हैं। कहते हैं यूपी के मतदाता की प्राथमिकता लोकसभा में राष्ट्रीय दल जबकि विधानसभा में राष्ट्रीय दल व क्षेत्रीय दल दोनों के विकल्प को सामने रखकर मतदान करता है। राष्ट्रीय परिस्थितियों पर नजर डालें तो कांग्रेस के बिना कोई गठबंधन लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ जनता के सामने मजबूत विकल्प खड़ा करता नहीं दिखता।
पहले 1993 और अब 2019... एक जैसी परिस्थिति ने सपा-बसपा को साथ आने के लिए मजबूर किया। तब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने और मंदिर आंदोलन की लहर पर सवार भाजपा को रोकने की मजबूरी थी तो इस बार भी भाजपा को रोकने और काफी हद तक अपना वजूद बचाने की कोशिश है। यही वजह है कि मायावती ने 2 जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड से उपजी दुश्मनी को भी भुलाने को मजबूर कर दिया।
प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने खुद को पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछड़ी जातियों का लगाव उनके साथ समय-समय पर दिखा भी है। 1993 में प्रदेश की आबादी में 8 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली यादव बिरादरी की सहानुभूति पूरी तरह मुलायम सिंह यादव के साथ थी। पर, आज अखिलेश के लिए इन्हें पूरी तरह अपने साथ रखना बहुत आसान नहीं है।
यही नहीं, कांशीराम की मौजूदगी में अनुसूचित जाति का 24 फीसदी वोट जिस तरह से बसपा के पक्ष में गया व सपा को जिताने में जुटा, आज वैसी परिस्थितियां नहीं हैं। दोनों पार्टियों में खेमेबाजी चरम पर है। मुलायम उतना सक्रिय नहीं हैं तो अलग दल बनाने वाले शिवपाल सिंह भाजपा को हराने के लिए अखिलेश का साथ देंगे, इसमें संदेह है।
साझा पत्रकार वार्ता में जिस तरह वे माया के निशाने पर रहे उसके बाद तो यह संदेह और गहरा गया है। बसपा के भी उस समय के कई चेहरे आज भाजपा, कांग्रेस और सपा के साथ खड़े हैं।
1993 विधानसभा चुनाव
पार्टी--जीते--मत प्रतिशत
भाजपा--177--33.30
सपा--109--17.94
बसपा--67 --11.12
कांग्रेस--28--15.08
2014 (लोकसभा में राष्ट्रीय स्तर पर)
दल--सीट--मत प्रतिशत
भाजपा --282--31.34
बसपा --00--4.9
सपा--05--22.35
कांग्रेस--44--19.52