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सपा-बसपा गठबंधन... यानी बहुजन समाजवाद..., क्या वाकई भाजपा के लिए है कड़ी चुनौती, ये हैं आंकड़े

Sun, 13 Jan 2019 04:09 PM IST
ishwar ashish अखिलेश वाजपेयी/ अमर उजाला, लखनऊ
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गठबंधन की घोषणा के बाद उत्साहित सपा-बसपा समर्थक। - फोटो : amar ujala
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सपा-बसपा गठबंधन... यानी बहुजन समाजवाद... यह नया समाजवाद लोकसभा चुनाव में प्रदेश में तो भाजपा व दूसरे दलों की लड़ाई को कांटे का बनाने के लिए तैयार है, मगर कांग्रेस को शामिल किए बिना राष्ट्रीय स्तर पर यह गठबंधन भाजपा के लिए चुनौती खड़ी करते नहीं दिखता है। आंकड़ों, तथ्यों, समीकरणों व अब तक के मतदान के तरीके पर नजर डालें तो संकेत यही मिल रहे हैं।

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सपा-बसपा गठबंधन के एलान के साथ ही लंबे समय से चली आ रही गैर भाजपा-गैर कांग्रेस गठबंधन की कवायद की नींव पड़ी। सबसे बड़े राज्य से इसकी शुरूआत देश की राजनीति को कहां तक ले जाएगी, यह तो वक्त बताएगा लेकिन जिस तरह ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव जैसे नेताओं ने इसे हाथों हाथ लिया, इसमें दो मत नहीं कि नतीजे दूरगामी होंगे।

यूपी में लड़ाई और दिलचस्प होगी। अगर गठबंधन यूपी में भाजपा की परीक्षा लेने जा रहा है तो उसे खुद भी इम्तिहान से गुजरना होगा। इसमें पास होने के बाद ही इसके आगे टिकाऊ बनने की संभावनाएं बनेंगी।
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सपा अभी पूरी तरह क्षेत्रीय दल है और इसका प्रभाव सिर्फ यूपी में ही है। वहीं, राष्ट्रीय दल होने के बावजूद बसपा का मुख्य प्रभाव भी यूपी में ही है। बसपा ने हाल ही में विधानसभा चुनाव में राजस्थान में 4, मध्यप्रदेश में 3, छग में एक सीट जीती है। उसका कर्नाटक में भी एक विधायक है। वहीं, सपा को सिर्फ मध्यप्रदेश में एक सीट पर जीत मिली।

लोकसभा चुनाव में यूपी के अलावा सपा ने आज तक कोई चुनाव नहीं जीता है। बसपा ने कांशीराम के समय पंजाब में लोकसभा की तीन सीटें जीती थीं, पर कांशीराम की मृत्यु के बाद बसपा का प्रभाव यूपी में सिमट कर रहा गया है। इससे लगता है कि सपा और बसपा का गठबंधन उत्तर प्रदेश के बाहर भाजपा की चुनावी गणित को बिगाड़ने की स्थिति में फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।

वजूद बचाना भी बड़ी मजबूरी

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि सपा व बसपा को डर है कि लोकसभा में भाजपा यदि 2019 में भी 2014 का प्रदर्शन दोहरा देती है तो समर्थकों के दिल और दिमाग से उनका प्रभाव ही खत्म हो जाएगा। इससे 2022 की चुनौती और बढ़ जाएगी। इसलिए दोनों किसी न किसी तरीके से भाजपा को रोकना चाहते हैं। हालांकि 1993 के आंकड़ों की कसौटी पर कसें तो सपा-बसपा को विधानसभा में कुल 176 जबकि भाजपा को 177 सीटें मिलीं यानि लगभग बराबर।

लोगों का तर्क है कि तब कल्याण सिंह सरकार के बर्खास्त होने से सहानुभूति की लहर भाजपा के साथ थी। इस बार भाजपा केंद्र व प्रदेश में सत्ता में है इसलिए उसे सत्ताविरोधी लहर का भी सामना करना पड़ेगा।

राजनीति शास्त्री प्रो. एसके द्विवेदी एक और परिस्थिति की तरफ भी ध्यान दिलाते हैं। कहते हैं यूपी के मतदाता की प्राथमिकता लोकसभा में राष्ट्रीय दल जबकि विधानसभा में राष्ट्रीय दल व क्षेत्रीय दल दोनों के विकल्प को सामने रखकर मतदान करता है। राष्ट्रीय परिस्थितियों पर नजर डालें तो कांग्रेस के बिना कोई गठबंधन लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ जनता के सामने मजबूत विकल्प खड़ा करता नहीं दिखता।

तब अयोध्या आंदोलन... इस बार भी भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन

पहले 1993 और अब 2019... एक जैसी परिस्थिति ने सपा-बसपा को साथ आने के लिए मजबूर किया। तब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने और मंदिर आंदोलन की लहर पर सवार भाजपा को रोकने की मजबूरी थी तो इस बार भी भाजपा को रोकने और काफी हद तक अपना वजूद बचाने की कोशिश है। यही वजह है कि मायावती ने 2 जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड से उपजी दुश्मनी को भी भुलाने को मजबूर कर दिया।

तब और अब की गणित

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने खुद को पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछड़ी जातियों का लगाव उनके साथ समय-समय पर दिखा भी है। 1993 में प्रदेश की आबादी में 8 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली यादव बिरादरी की सहानुभूति पूरी तरह मुलायम सिंह यादव के साथ थी। पर, आज अखिलेश के लिए इन्हें पूरी तरह अपने साथ रखना बहुत आसान नहीं है।

यही नहीं, कांशीराम की मौजूदगी में अनुसूचित जाति का 24 फीसदी वोट जिस तरह से बसपा के पक्ष में गया व सपा को जिताने में जुटा, आज वैसी परिस्थितियां नहीं हैं। दोनों पार्टियों में खेमेबाजी चरम पर है। मुलायम उतना सक्रिय नहीं हैं तो अलग दल बनाने वाले शिवपाल सिंह भाजपा को हराने के लिए अखिलेश का साथ देंगे, इसमें संदेह है।

साझा पत्रकार वार्ता में जिस तरह वे माया के निशाने पर रहे उसके बाद तो यह संदेह और गहरा गया है। बसपा के भी उस समय के कई चेहरे आज भाजपा, कांग्रेस और सपा के साथ खड़े हैं।
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आंकड़ों की नजर में गठबंधन

1993 विधानसभा चुनाव
पार्टी--जीते--मत प्रतिशत
भाजपा--177--33.30
सपा--109--17.94
बसपा--67 --11.12
कांग्रेस--28--15.08

2014 (लोकसभा में राष्ट्रीय स्तर पर)
दल--सीट--मत प्रतिशत
भाजपा --282--31.34
बसपा --00--4.9
सपा--05--22.35
कांग्रेस--44--19.52
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