1- क्या इस कपटपूर्ण भुगतान के दौरान लेखा विभाग ने क्या लापरवाही की?
2- इसके लिए दोषी कौन है?
3- हर महीने बैंक समाधान विवरण बनाने की अनिवार्यता होने के बावजूद क्यों नहीं तैयार हुआ?
4- अगर बैंक समाधान विवरण बना तो फिर मामला पकड़ में कैसे नहीं आया?
5- वर्ष 2000 के चेक अगर संबंधित व्यक्ति नहीं ले गया तो निर्धारित अवधि के बाद उन्हें नष्ट क्यों नहीं किया गया?
6- चेकबुक किसके कब्जे में रहती है? चेक बुक से केवल वही चेक नंबर क्यों चुने गए जो बेहद मामूली रकम के थे।
7- जिन फर्जी चेक से कपट करके रकम निकाली गई उनके मूल चेक का भुगतान वर्ष 2000 में हुआ या फिर नहीं?
8- ये मामला सिर्फ इसी साल का है या फिर बीते सालों में भी इस तरह के फर्जी भुगतान होते रहे?
लविवि प्रशासन ने समिति बनाने का पत्र जारी करके पूरी तरह से चुप्पी साध ली है। समिति को जांच के बजाय सिर्फ समीक्षा करने के लिए क्यों कहा गया है। इसका जवाब नहीं दिया जा रहा है। विवि प्रशासन ने इससे पहले फर्जी अंकपत्र मामले में भी परीक्षा कामकाज की समीक्षा करने के लिए समिति बनाकर अपना पल्ला झाड़ा था। इस मामले में भी वही काम किया जा रहा है।
बैंक समाधान विवरण बनाने तक के लिए किया भुगतान
विवि के लेखा विभाग की काबिलियत बताने के लिए स्थानीय लेखा निधि परीक्षा विभाग की रिपोर्ट ही काफी है। इसकी वित्तीय वर्ष 2014-15 की समीक्षा करने के बाद जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि यहां पर छह लाख 86 हजार 520 रुपये का भुगतान सिर्फ बैंक समाधान विवरण बनाने के लिए किया गया।
जबकि बैंक समाधान विवरण तैयार करना किसी भी लेखा विभाग का सामान्य काम है। कैश बुक की इंट्री करने के दौरान बैंक समाधान विवरण तैयार करना एक अनिवार्य काम है।