लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में जिन 13 सीटों पर मतदान होने जा रहा है उनमें यादवों से अधिक कुर्मी, कुशवाहा, राजभर, बिंद, चौहान, पाल, प्रजापति और निषाद समेत गैर यादव पिछड़ी जातियों की आबादी ज्यादा है। लिहाजा इन सीटों पर चुनावी समीकरण बनाने-बिगाड़ने में इन जातियों की बड़ी भूमिका रहती है। ऐसे में सातवें चरण के मतदान में एनडीए और इंडिया के बीच अपनी-अपनी बढ़त के लिए गैर यादव ओबीसी मत हासिल करने के लिए भी जंग होगी। इसी समीकरण को ध्यान में रखकर पक्ष और विपक्ष ने कई सीटों पर इन जातियों के उम्मीदवार उतारे हैं।
मोदी के सहारे भी समीकरण साधने की कोशिश
अगर एनडीए की बात करें तो इस चरण की 13 में से दो सीट सहयोगी दल अपना दल (एस) और एक सुभासपा के खाते में है। इसके बावजूद भाजपा वाराणसी से तीसरी बार चुनाव लड़ रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे बड़े पिछड़े चेहरे के तौर पर पेश कर रही है। भाजपा मोदी के सहारे ही अंतिम चरण की सभी सीटों के समीकरण को साधने की कोशिश में जुटी है।
प्रत्याशियों के चयन में रखा समीकरणों का ख्याल
प्रत्याशियों के चयन में भी दोनों तरफ से अंतिम चरण की सीटों पर गैर यादव पिछड़ी जातियों के समीकरण का ख्याल रखा गया है। इसीलिए इन बिरादरियों के चेहरों को ही मौका दिया गया है। दोनों गठबंधनों का मानना है कि पूरब में राजनीतिक रूप से सक्रिय इन जातियों को मौका देने से इनकी उप जातियों पर भी प्रभाव पड़ेगा, जिसका फायदा चुनाव में मिल सकता है।