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पढ़िए, ये आईआईटियंस क्यों चोरी-छिपे खाते थे घी?

Fri, 01 Jan 2016 03:18 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, कानपुर
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1981 बैच के कानपुर के आईआईटियंस ने गुरुवार को कैंपस में पुरानी यादें ताजा कीं। कहा कि हम अपने घर से डिब्बे में घी लाते थे और चोरी-छिपे मेस में ले जाकर खाते थे। डिब्बे में घी देखते ही साथी टूट पड़ते और पूरा घी चट कर जाते थे।
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अब तो रोटी में घी लगाकर दी जा रही है। यानी खाने की गुणवत्ता आईआईटी ने सुधारी है। खाना अब घर जैसा है।  कुछ बोले, अब आईआईटी की पढ़ाई महंगी हो गई है।

हमारे जमाने में एडमिशन की प्रॉब्लम होती थी। फीस कम थी मेस भी 150 रुपये महीने में निपट जाता था। एलमनाइ मीट का उद्घाटन निदेशक प्रो. इंद्रनील मन्ना ने किया। फिर कई पुरातन छात्रों को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया।

इस बीच पुरानी यादों में खोए तमाम आईआईटियंस भावुक हो गए और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। इस दौरान आईआईटियंस ने खाने-पीने के साथ कैंपस में सैर-सपाटा भी किया।
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एलमनाइ मीट में बैच के करीब 30 स्टूडेंट अपने परिवार के साथ आईआईटी कैंपस पहुंचे थे। पुराने दोस्तों को देख कई गले से लिपट गए। कई ने एक-दूसरे के साथ हंसी-ठिठोली के साथ परिवार के साथ मुलाकात भी की।
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खूब मस्ती हई जब मिले पुराने यार

एलमनाइ मीट में पुरातन छात्रों का जमावड़ा रहा। इसमें छात्रों ने अपने अनुभवों को बांटा और यार दोस्त के साथ जमकर मस्ती की।

मसकट में ऑटोमोटिव कंपनी के जनरल मैनेजर अरुप रॉय ने बताया कि वह लगभग 20 साल बाद आईआईटी कैंपस में आए हैं। उन्हें यहां इंफ्रास्ट्रक्चर अच्छा पर हास्टल में कमी दिखी।

बोले, हमारे समय में यहां पर छह हॉस्टल थे। अब ये 12 हैं। वहीं छात्रों की तादाद चार गुना बढ़ गई है। ऐसे में यहां हॉस्टल और बनने चाहिए।

इलाहाबाद में निप्स कॉलेज फॉर आईटी एंड मैनेजमेंट के संस्थापक संजीव गोयल ने बताया कि आज आईआईटी कानपुर में वापस आकर ऐसा लगा जैसे कि हम अपने घर वापस आ गए हैं।

यहां बिताए पांच सालों में हमने बचपन से यौवन और यौवन से परिपक्व आदमी बनने का सफर तय किया। आज एक बार फिर इसे देखना सुखद अनुभव रहा।
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