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आम, आवाम और अवध...एक नायाब रिश्ता

Sat, 27 Jul 2013 05:59 PM IST
लखनऊ/आरिफ
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हर शहर अपने कुछ दीवानों की वजह से अलहदा पहचान रखता है। यही दीवानगी तहजीब की शमां को भी फिरोजा रखती है। यूं तो रिवायत से सभी को मोहब्बत होती है पर इसे गले का हार बना लेना चंद खुशनसीबों के ही हिस्से आता है।
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शहर के मलिहाबादी आम पूरी दुनिया में एक खास पहचान रखते हैं। इन्हीं को इसके कुछ दीवाने आम की महक को शायरी के साथ मिला कर परोस रहे हैं तो कुछ इसे ‘दावत-ए-आम’ बना कर अपना शौक पूरा कर रहे हैं।

इस शगल में अब नई पीढ़ी भी दिलचस्पी दिखा रही है और इसका स्वरूप बदल कर ‘मैंगो फेस्टिवल’ के तौर पर मना रही है।

रुत आम की आए और न हो यार,
जी अपना है किसी रुत से बेजार (गालिब)

दावत-ए-आम की बेकरारी
चौधरी शर्फुद्दीन 80 बसंत देख चुके हैं। वे पिछले पैंतीस सालों से हर साल अपने घर ‘नियामतउल्ला कोठी’ पर ‘दावत-ए-आम’ देते हैं। छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब कोई भी इसमें शिरकत कर सकता है। यहां मेहमान अलग-अलग किस्म के जितने चाहे आम खा सकते हैं, वह भी मुफ्त।
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दावत का मौजूं होता है ‘गालिब और आम’। शेरो-शायरी, मजाहिया किस्से-कहानियों से भरपूर इस दावत का शहरवासियों को हर साल बेसब्री से इंतजार रहता है।

चौधरी साहब फरमाते हैं कि सन् 62 में कुछ दोस्तों (जिनमें मौलाना हाशिम फरंगी महली, नसीम अनहोनवी, कारी वजुदुल हई, डॉ. दावर हुसैन, मुन्नवर आगा, जुनुसुद्दीन उर्फ बाबू मियां व हबीब अहमद सिद्दीकी, शामिल थे) के साथ एक क्लब की शुरुआत की।

बेमकसद शुरू दोस्तों के इस क्लब को जल्द ही एक मकसद मिल गया ‘आम और गालिब’ की शक्ल में। बताते हैं, दरअसल उस वक्त मेरे आम के बाग होते थे जहां से आम आते और हम दोस्त लोग मिल बैठ कर इसे बड़े शौक से खाते। इस दौरान शेरो-शायरी और किस्से कहानियों का सिलसिला भी चलता रहता।

आम का मीठा रस और चाशनी से मीठी शायरी... बेजोड़। बस यहीं से ये सिलसिला शुरू हुआ, सन् 72 तक हमारे कारवां में काफी लोग शामिल हो चुके थे। हमने इसे ‘दावत-ए-आम’ की शक्ल दे दी।

आमों के राजा कहिए जनाब....
माल के राजा भूपेंद्र सिंह कहते हैं कि आम की दावत की मेजबानी वही कर सकता है जिसके बाग में किस्म-किस्म के आम हो। बाजार में बिकने वाले आम तो कोई भी खरीद कर खा सकता है पर आम की ऐसी सैकड़ों प्रजातियां हैं जिन्हें लोग न जानते हैं न ही वे बाजार में आती हैं।
















बागवान उन्हें केवल अपने शौक के लिए ही उगाते हैं। ऐसी किस्मों से मेहमानों को रूबरू करवाने के लिए दावतों का सिलसिला हमारे परदादा के दादा ठाकुर जंगी सिंह ने 1900 में शुरू किया था। उसे हमने अपनी रवायत बना कर आज तक कायम रखा।

वे बताते है कि आम की दावत में नमकीन व्यंजन भी बेहद जरूरी हैं, जिससे एक किस्म का आम खाने का बाद मुंह का जायका बदल कर दूसरी वैराइटी का लुत्फ लिया जाए ताकि टेस्ट अलहदा रहे। कौन से आम पहले खाया जाए... और कौन सा उसके बाद ये मेजबान की समझदारी पर निर्भर करता है।

वे बताते हैं कि मैं छोटा था तब हमारे यहां तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त आए। इतने ज्यादा सूरत और सीरत के आम चख कर वे पिताजी से बोले ‘आप रियासत के नहीं ,‘आमों के राजा’ हैं।

मशहूर शायर मुनव्वर राना आमों के मुताबिक फरमाते हैं,
इंसान के हाथों की बनाई नहीं खाते
हम आम के मौसम में मिठाई नहीं खाते
कहते हैं कि आम की दावत देने वाले मेजबान के बागात हो ये जरूरी नहीं। दावत देने वाले का दिल बड़ा होना चाहिए। यादों के साए में गोते लगाते हुए वे कहते हैं रायबरेली (जहां मेरा बचपन गुजरा) में ऐसे कई राजे राजवाड़े थे जिनके पास आम के काफी बाग थे।
इसे वे यूं भी कहते हैं,
किस्मत में इस फकीर के एक पेड़ भी नहीं
लेकिन अमीरे शहर की दावत हमीं ने की।
वे कहते हैं मेजबान की नीयत से आम की लज्जत कई गुना बढ़ जाती है। वे आगे कहते हैं,
अल्लाह जानता है मोहब्बत हमीं ने की
गालिब के बाद आमों की इज्जत हमीं ने की।

पद्मश्री हाजी कलीमुल्ला आम की दावतों की बाबत बताते हैं कि ये सिलसिला कब से चल रहा है सही-सही बताना तो मुमकिन नहीं है। पर ये काफी पुराना और पीढ़ियों से चला आ रहा है। वे कहते हैं कि मेरे यहां होने वाली दावत में लोगों को अपने बाग का खास पेड़ (जिसमें 300 तरह के फल आते हैं) दिखा कर एकता का संदेश देता हूं।

तोहफे में भी मिलते थे आम
लखनऊ के मशहूर शायर ब्रज नारायण चकबस्त के नवासे गोपाल चकबस्त के मुताबिक लखनऊ की खासियत यहां के लोगों का खाने-खिलाने का शौक है। त्यौहारों, उत्सवों के अलावा आम की दावत भी उन्हीं में से एक मौका है। दावत के बाद रुखसत होते वक्त मेहमानों को रास्ते के लिए पेटी-पेटी भर के आम भी तोहफे में दिए जाते थे।

हम किसी से कम नहीं
वहीं इस साल बाराबंकी के सैदपुर में मैंगों फेस्टिवल मना कर सुर्खियों में आईं ज्योत्सना हबीबुल्लाह कहती हैं कि आम की दावत देने के लिए किसी खास उम्र तक पहुंचने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है। मैंने इस बार नए तरीके व विचारों से इस रवायत को नया रंग दिया है। जिसे खास तौर से जेन एक्स ने खूब सराहा।
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